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मैं नीर भरी दु:ख की बदली!

मैं नीर भरी दु:ख की बदली!

✍️ लेखन: महादेवी वर्मा

मैं नीर भरी दु:ख की बदली!

स्पंदन में चिर निस्पंद बसा;

 

क्रंदन में आहत विश्व हँसा,

नयनों में दीपक-से जलते

 

पलकों में निर्झरिणी मचली!

मेरा पग-पग संगीत-भरा,

 

श्वासों से स्वप्न-पराग झरा,

नभ के नव रँग बुनते दुकूल,

 

छाया में मलय-बयार पली!

मैं क्षितिज-भृकुटि पर घिर धूमिल,

 

चिंता का भार, बनी अविरल,

रज-कण पर जल-कण हो बरसी

 

नवजीवन-अंकुर बन निकली!

पथ को न मलिन करता आना,

 

पद-चिह्न न दे जाता जाना,

सुधि मेरे आगम की जग में

 

सुख की सिहरन हो अंत खिली!

विस्तृत नभ का कोई कोना;

 

मेरा न कभी अपना होना,

परिचय इतना इतिहास यही

 

उमड़ी कल थी मिट आज चली!

मैं नीर भरी दु:ख की बदली!

 

 

स्रोत पुस्तक : संधिनी (पृष्ठ 93) रचनाकार : महादेवी वर्मा प्रकाशन : लोकभारती प्रकाशन संस्करण : 2012

 

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