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उदास एक मुझी को तो कर नहीं जाता

✍️ लेखन: वसीम बरेलवी

उदास एक मुझी को तो कर नहीं जाता

वो मुझसे रुठ के अपने भी घर नहीं जाता

 

वो दिन गये कि मुहब्बत थी जान की बाज़ी

किसी से अब कोई बिछडे तो मर नहीं जाता

 

तुम्हारा प्यार तो साँसों मे साँस लेता है

जो होता नश्शा तो इक दिन उतर नहीं जाता

 

 'वसीम' उसकी तड़प है, तो उसके पास चलो

कभी कुआँ किसी प्यासे के घर नहीं जाता


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