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अक्सर ऐसा हो जाता है

✍️ लेखन: घनश्याम कुमार

अक्सर ऐसा हो जाता है

 

तुम जानती हो छोटे से घर से उठ कर आना और सुकून की तलाश में भटकना मन को कुरेदता था। सबके साथ रहकर सबसे मिलकर बेहतर-से-बेहतर पाने की जद्दोजहद में यहाँ से वहाँ चक्कर लगाना, थकान से भर देता था। रातों को नींद नहीं आना और करवट पे करवट लेना, उम्मीद के सभी रास्ते को खत्म कर रहा था...। तुमसे तभी मुलाकात हुई थी।

“हाँ जानती हूँ। तुमने हज़ारों बार अपनी आपबीती जो सुनाई है। प्रत्येक शब्द से वाकिफ हूँ।”

“तो तुम यह भी जानती ही हो कि गाँव-समाज और परिवार का अपना एक अलग ही संसार होता है।”

“हाँ! जानती हूँ और इसको जी भी रही हूँ।”

“तब तुमको मेरी मजबूरी क्यूँ नहीं समझ में आ रही है? काहे तुम अड़ गई हो?”

“मैं अड़ गई हूँ! अब पिताजी की बात को नही मानूँगी तो कइसे चलेगा। उनको मेरी फिक्र है। उनकी बेटी हूँ, सब-कुछ देख-भाल के ही तो बिहायेंगे। अब वो नहीं मान रहे हैं, तो इसमें मेरी क्या....”

“तुम्हारी क्या...। सभी गलतियाँ मेरी ही है। कहीं जाऊँगा तो क्या बताऊँगा। मेरा घर छोटा है! उसके पिताश्री का समाज में एक रुतबा है...।”

“रहने दो! तुमको अपनी सूझ रही है।”

“अच्छा तो अब मुझे अपनी सुझने लगा है। मुझसे प्रेम करने से पहले तुमने मेरा घरबार देख था! क्या मैंने तुम्हारा घर बार देखा था, नहीं न। प्रेम तो हो गया था न, हम दोनों को।”

“तब की बात तब थी। अब उसके बहुत दिन हो गए हैं। मेरा परिवार है समाज है। सब के सामने पिताजी क्या मुँह दिखाएँगे....”

“अच्छा! और मेरा कुछ नहीं है। मेरे भी भाईयों ने मुझे पढ़ाया-लिखाया है। पिता जी का नाम है। छोटी-बड़ी बहन है। समाज है। तुमको जब अपने समाज की पड़ी है तो मुझे भी तो....”

“तुम अपना रोना लेकर बैठ क्यूँ जाते हो? समझ नहीं आता।”

“समझ कैसे आएगा? परिवार और बड़ा घर तुम्हारा ही, तो है। सबकी अपनी इज्जत होती है वर्षा। मेरा भी है। तुमने मेरे संघर्ष को देखा है। उनमें मेरे भाइयों का त्याग भी देखा है। आज मेरे पास छोटा घर है और कुछ कमा रहा हूँ, तो वह मेरे परिवार की देन है। हम सबमें एक समझ है। तुमको तो मेरे घर पर सब ने स्वीकार कर लिया है न!”

“ज्यादा ज्ञान न बघारो!”

“ज्ञान कैसे दूँ? तुम स्वयं ज्ञानी हो। तुम समझाओगी तो मानेंगे नहीं।”

“नहीं मान रहे...”

“लेकिन प्रेम विवाह के लिए मान गए थे।”

“तब की बात और थी, उन्होंने तुम्हारा घर-परिवार नहीं देखा था।”

“कहीं ऐसा तो नहीं कि तुम ही अड़ंगा लगा रही हो...”

“मैं! तौबा-तौबा...”                

“तुम जानती हो न कि रुपया-पैसा, बिजनेस के लिए बचा के रखा हूँ। उससे घर बनाने की जब बात करूँगा तो क्या मैसेज जाएगा।”

“कुछ नहीं जाएगा, तुम बनाना नहीं चाहते...”

“क्या सोचेंगे सब कि देखो भाइयों ने पढ़ाया-बनाया और आज शादी भी नहीं हुई कि घर बनाने लगा। जब पैसा था ही तो पहले बनाता। सीधा अलग होने का सोच रहा है। भला करे उसके भाइयों का जो भरत जैसा सुभीता भाई मिला।”

“तुम यह सोच रहे हो! अपने भविष्य का नहीं...”

“अपने भविष्य का... भूतकाल का क्या करूँ। सब कुछ छोड़ दूँ। यह संभव नहीं जान पड़ता। मेरे घर वालों के साथ जब तक रहोगी नहीं तब तक दिक्कतों का पता कइसे चलेगा?”

“पिताजी ने मना कर दिया मतलब कर दिया।”

“चलो बढ़िया है, तुम अपनी तरफ से कोई मेहनत नहीं करोगी। घर छोटा हो या बड़ा, वहाँ प्रेम न हो तो घर का कोई अर्थ ही नहीं रह जाता। प्रेम हो तो छोटे से घर को भी बेहतरीन बनाया जा सकता है। मेरे घर वालों ने तुमको स्वीकार किया था, मेरी बहनों ने तुम्हारे लिए लड़ाइयाँ लड़ी थी और आज मुकर रही हो। तुम्हारे घर में कौन है जो लड़ाई लड़े तुम्हारे लिए। तुम अपने पिताजी की आज्ञा मानों और मैं अपने परिवार के साथ देने वाले रवैये को अपनाता हूँ।”

जीवन की अपनी धुरी है, वह किसी के प्रतिरोध से रुकता नहीं अपितु अनवरत चलते चले जाता है। बेहतरीन खोजा नहीं जा सकता, चलते-चलते मिल जाता है। हम दोनों भी उसी तरह मिल गए थे। मिलने में क्रिया थी और फल साथ चलने में था। आज एक वाक्य का अंत होने वाला है, अगर हम चाहते तो संभावनाओं को तलाश सकते थे। तलाशने से बेहतर गर रूढ़ हो जाना है तो अर्थ संकुचन स्वाभाविक है। इस दुनिया के अधिकांश प्रेम पर परिवार के प्रतिकार का मुहर लग जाता है, मेरे प्रेम पर भी लग गया। वास्तविक कारण चाहे धोखा देना रहा हो या साथ नहीं रहने की मजबूरी का; पर परिवार का आगमन हो जाता है।

चलो बादल

अपने समय को खोजों

खोजों कि तुम फिर से सरसों के फूल-सा

खिलखिला सको

आँगन में बार-बार आ सको

बुहारे जाने के उपरांत भी

देखो कि सूरज फिर से निकलने वाला है

अंधेरा फिर से छटने वाला है

बादल फिर से बरसने वाला है

छतरियों को फेक दो

फेंक दो इतनी दूर कि

तुम वर्षा का पुनः आनंद ले सको

निकलने दो दूभ को फिर से

घटने दो प्रत्येक घटनाओं को

बार-बार बार-बार

चलो बादल

अपने समय को खोजों।

 

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