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बीमार वो नहीं, मैं था

बीमार वो नहीं, मैं था

✍️ लेखन: कपिल मिश्रा

बीमार वो नहीं, मैं था

 

महीनों बाद आज जब मैं अपने पुराने दोस्त विकास से मिला, तो अंदर तक हिल गया। वह एक महंगे प्राइवेट अस्पताल के डीलक्स वार्ड के बिस्तर पर लेटा था। उसके हाथ में ड्रिप लगी थी और चेहरे पर ऑक्सीजन मास्क।

‘‘बहुत गंभीर हालत है भैया, दुआ करो’’ उसकी पत्नी ने आँसू पोंछते हुए फुसफुसाकर मुझसे कहा।

मैं भारी मन से उसकी बगल वाले स्टूल पर बैठ गया। तभी विकास ने धीरे से आँखें खोलीं। मुझे देखते ही उसने मास्क थोड़ा नीचे खिसकाया और बेहद कमजोर आवाज़ में बोला, ‘‘अरे... रमेश! तुमतुम कब आए सुनो... वो मेरे इंस्टाग्राम की आखिरी रील देखी क्या? उसपे व्यूज बहुत कम आ रहे हैं, जरा अपने ऑफिस के ग्रुप में शेयर कर देना।’’

मैं अवाक रह गया। इस हालत में भी उसे लाइक्स की चिंता थी?

तभी उसकी पत्नी बीच में बोल पड़ी, ‘‘अरे आप चुप रहिए, डॉक्टर ने बोलने से मना किया है।’’ फिर वह तुरंत मेरी तरफ मुड़ी और अपना आईफोन आगे बढ़ाते हुए बोली, ‘‘भाई साहब, आप आ ही गए हैं तो प्लीज विकास के साथ बेड पर लेटे हुए मेरी एक फोटो खींच दीजिए। स्टे स्ट्रांग हब्बीलिखकर फेसबुक और व्हाट्सएप स्टेटस पर डालना है। लोग पूछ रहे हैं कि कौन से हॉस्पिटल में हैं।’’

इतने में नर्स कमरे में आई। उसने मरीज की नब्ज देखने के बजाय पहले कमरे का एसी ठीक किया और फिर विकास की पत्नी से कहा, ‘‘मैडम, आपके लाइव वीडियो पर किसी ने कमेंट किया है कि हॉस्पिटल का बैकग्राउंड बहुत अच्छा है, नाम बता दीजिए। जरा रिप्लाई कर दीजिए, हॉस्पिटल की रीच बढ़ेगी।’’

मैं स्तब्ध खड़ा था। वहाँ एक इंसान जिंदगी और मौत के बीच झूल रहा था, और बाकी सब सोशल मीडिया की लाइक और रीचके बाजार में अपनी दुकानें सजाए बैठे थे।

मुझे अचानक घुटन होने लगी। मैं बिना कुछ बोले वार्ड से बाहर भाग आया। बाहर आकर मैंने ताजी हवा में एक लंबी साँस ली और खुद से कहा ‘‘अस्पताल के उस कमरे में बीमार वो नहीं... असल में बीमार मैं था, जो इस सोशल मीडिया की अंधी और संवेदनहीन दुनिया में इंसानियतऔर जज्बातढूँढने चला आया था।

 

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