कृपया प्रतीक्षा करें...
✍️ लेखन: आतिश कुमार
मिट्टी की दीवारों वाला घर। घर के दरवाजे से घुसते ही एक बड़ा-सा आँगन। आँगन के बीच में लगा एक छोटा-सा तुलसी का पौधा। पौधे के पास खड़े होकर चारों ओर देखो तो किचन से लेकर सभी के कमरों की हलचल दिख जाए। उसी तुलसी वाले पौधे के पास एक चबूतरा भी था। उस चबूतरे पर रखा है एक पानदान। पानदान ऐसा जिसके बाहर हीरे जैसे मोती लगे हैं, जिसको खोलते ही एक ऐसी सौंधी ख़ुशबू आए जिससे खोलने वाले का दिल झूम उठे। ये पानदान घर के राजा बेटे मोनू की दादी का था। दादी जिनका इस बड़े से घर में कमरा नहीं था। वो एक मंदिर वाले कमरे में रहती हैं, एक तस्वीर में। तस्वीर जिसमें कोई रंग न होकर भी कई रंग हैं।
बचपन में मोनू हर रोज़ सुबह उठकर उस पानदान को खोलता, उसकी सुगंध को महसूस करता और उसके बाद ही स्कूल के लिए तैयार होने जाता था। उसने बचपन में कई बार अपनी दादी से उस पानदान की कहानी के बारे में पूछा था। उसकी उत्सुकता उसमें रखे पान को खाने से ज़्यादा उस पानदान के दादी के जीवन में आने की थी। हालाँकि, दादी ने कभी उस पानदान की कहानी नहीं बताई। आज मोनू इस बड़े से घर में 20 साल बाद लौटा है। आँगन वैसा का वैसा ही है। मोनू के हाथ में दादी का पानदान है लेकिन आँगन में अब न तो वो तुलसी का पौधा है और न ही वो चबूतरा। दरअसल, अभी कुछ दिन पहले ही मोनू ने अपनी माँ से पानदान की कहानी पूछी थी। माँ को जितना पता था उन्होंने वो सब बता दिया था।
मोनू को माँ ने बताया था कि पानदान को दादी अपने ससुराल से लाई थी। जब वो 15 साल की थी तभी उनकी शादी हो गई थी। दादी की बड़ी बहन ने उन्हें तोहफ़े में इस पानदान को दिया था। इसको देते वक्त दीदी ने दादी से कहा था कि ससुराल में जब कोई साथ नहीं होगा तब ये तुम्हारे सुख-दु:ख का साथी बनेगा। तब दादी को ये बात बहुत बचकानी लगी थी कि एक नॉन लीविंग थिंग कैसे साथी बनेगा। लेकिन जब ससुराल में उनके कुछ दिन गुज़रे और शादी के 10 साल बाद जब उनके पति यानी तेरे दादा की अचानक मृत्यु हुई… तब उन्हें ये पानदान एक चमत्कारी दोस्त-सा लगा।
माँ आगे बताती हैं कि दादी ने उन्हें भी इस पानदान की पूरी कहानी नहीं बताई। माँ ने भी उनको देखकर ही पानदान से उनके रिश्ते की परिभाषा को समझा था। माँ कहती है कि दादी इस पानदान से हमेशा पान नहीं खाया करती थी। वो इस पानदान में सुपारी काटकर तभी रखती थी। जब घर में सुख का माहौल होता था। उन्हें सुख का होना बहुत क्षणभंगुर लगता था। उन्होंने छोटी-सी उम्र में इतने दुख देखे थे कि वो सुख के पलों को हमारे जैसे कभी सेलीब्रेट नहीं करती थी। वो पानदान में सुपारी काटकर दु:ख के आने का इंतज़ार करती थीं और जैसे ही कोई दु:ख आता था तो चुपचाप आँगन के उस चबूतरे पर बैठकर पान बनाना शुरू कर देती थी और अपने दु:खों को उस पान में चबाती रहती थीं। माँ आगे कहती है कि इससे ज़्यादा उन्हें नहीं पता और अगर मोनू को जानना है तो उसे गाँव वाले घर जाना होगा।
यही वजह मोनू को गाँव वाले घर ले आई है। उसे दादी की कहानी से ज़्यादा इस पानदान के बारे में जानना था। मोनू अभी गाँव के उस पुराने घर की दहलीज़ पर खड़ा है। पानदान उसके गोद में है। जैसे ही वह अंदर घर के अंदर कदम रखता है उसे अजीब-सी अनुभूति होती है। उसके चारों ओर बचपन की स्मृतियाँ धीरे-धीरे जागने लगती हैं। उसे लगता है कि वो वक्त में कहीं पीछे लौट आया है जैसे घर की मिट्टी ने उसकी यादों को फिर से सजीव कर दिया हो। दीवारों पर लगी पपड़ी से झाँकते अतीत के रंग और समय के अनदेखे निशान अब उसे देख रहे हैं।
जैसे ही मोनू पानदान को खोलता है उससे वही पुरानी सौंधी ख़ुशबू फैल जाती है। लेकिन इस बार ये ख़ुशबू सामान्य नहीं थी। मानो उसमें समय का एक रहस्यमयी सूत्र छुपा हो। उसकी आँखों के सामने हल्की धुंध-सी फैल जाती है और उसमें से एक अनजानी रोशनी झाँकने लगती है। मोनू को एक पल के लिए एहसास होता है कि यह पानदान केवल एक वस्तु नहीं, बल्कि एक दरवाजा है—एक ऐसी दुनिया का दरवाजा जो स्मृतियों और समय के रहस्यों से बना है। जैसे ही वह पानदान को थोड़ा और खोलता है, उसके भीतर उसे एक चमकती हुई, तरल-सी गोलाकार वस्तु दिखती है। वह धीरे-धीरे उस तरल की ओर हाथ बढ़ाता है और जैसे ही उसे छूता है उसके चारों ओर का दृश्य बदलने लगता है।
अचानक, मोनू को लगता है कि वह अपने ही अतीत के एक पल में खड़ा है। मोनू पानदान को गोद में लिए एक चबूतरे पर बैठा था। अंधेरा बढ़ रहा था और पूरे घर में ख़ामोशी पसरी हुई थी, मानो रात का हर कतरा उसकी दादी की कहानियों को धीरे-धीरे बाहर ला रहा हो। पानदान से उठती हल्की-सी चमक मोनू के चेहरे पर पड़ रही थी। उसकी आँखों में जिज्ञासा और दिल में एक अजीब-सी बेचैनी थी। अचानक उसे किसी के कदमों की आहट महसूस होती है। उसने नज़र उठाई तो उसे दादी अपने साधारण से सफेद लिबास में दिखीं।
दादी ने उसके पास आकर पानदान की ओर इशारा किया, “बेटा, क्या तू सच में तैयार है इसे खोलने के लिए? इसमें सिर्फ़ मेरी नहीं इस घर की, इस आँगन की और इस मिट्टी की कहानियाँ हैं।”
मोनू ने गहरी सांस ली और पानदान की ओर देखा, “दादी, आप ही तो हमेशा कहती थीं कि पानदान को सिर्फ बाहरी दुनिया में झाँकने के लिए मत खोलो, उसे भीतर की कहानियों को महसूस करने के लिए खोलो। आज मैं इन कहानियों को जानना चाहता हूँ।”
दादी मुस्कुराई और धीरे से चबूतरे पर बैठ गईं। पानदान अचानक और चमकने लगा, मानो वो इस संवाद का हिस्सा बनना चाह रहा हो। उसकी चमक अब एक तस्वीर बनाती प्रतीत हो रही थी। उस तस्वीर में मोनू को दादी का अतीत दिख रहा था।
मोनू धीरे-धीरे पास जाकर दादी के पास बैठ जाता है। उसे एहसास होता है कि वो दादी से बात कर सकता है। वो कुछ बोलने ही वाला होता है कि दादी ही उस से पहले बोलती हैं, “अब तू यहाँ आ ही गया है तो इस पानदान का रहस्य जानने का समय आ गया है।” दादी की आवाज में एक रहस्यमयी गहराई है, जो उसे अपनी ओर खींच रही है। आगे फिर दादी बताती हैं कि ये पानदान केवल एक स्मृति नहीं है बल्कि एक ऐसा उपकरण है जो समय को महसूस कर सकता है। वो कहती हैं – “जब भी मैं पानदान में पान बनाती थी तो ये ही मेरे दु:ख और सुख के क्षणों को अपने भीतर समेट लेता था। अब यह एक ऐसा जरिया बन गया है जो उन भावनाओं को तुझसे साझा कर सकता है।”
मोनू की जिज्ञासा बढ़ती जाती है और जैसे ही वो पानदान के भीतर और गहराई में झाँकता है, उसे अलग-अलग समय के झरोखे दिखाई देने लगते हैं। वो अपने जीवन के विभिन्न महत्वपूर्ण पलों को देख सकता है। बचपन की सुबहें, स्कूल के दिन, मन की गोद में बिताए अनमोल पल। इसी बीच उसे अपने भविष्य की कुछ झलकियाँ भी दिखने लगती हैं। वो देखता है कि भविष्य में उसके जीवन में भी कई चुनौतियाँ आएँगी। दादी उसे समझाती हैं कि ये पानदान केवल समय को देखने का ही नहीं, बल्कि उसे समझने और उसे स्वीकार करने का भी ज़रिया है।
जब मोनू समय की लहरों में गहराई से उतरता है तो उसे यह भी एहसास होता है कि पानदान उसकी दादी के प्रेम और उनकी इच्छाओं का प्रतीक है। ये एक जीवित स्मृति बन गया है जो उस प्रेम की कहानी कहता है जिसे समय भी मिटा नहीं सकता। धीरे-धीरे वो एक ऐसी दुनिया में पहुँचता है जहाँ दादी का अस्तित्व केवल एक स्मृति नहीं बल्कि एक मार्गदर्शक शक्ति बन गया है। वो महसूस करता है कि जैसे ये पानदान उसके मन के किसी अज्ञात कोने को छू गया हो और उसे उसकी जड़ों से जोड़ दिया हो। मोनू जान जाता है कि ये पानदान केवल एक वस्तु नहीं, बल्कि एक ब्रह्मांड है। दादी के प्रेम, त्याग और जीवन के अनुभवों का एक अटूट स्रोत। जैसे ही मोनू वापस वर्तमान में लौटने लगता है उसे एक आवाज सुनाई देती है। वो पानदान के भीतर झाँकता है। वो आवाज धीमी पर मानो किसी गहरे कुएँ से आ रही हो। "तू कौन है?" पानदान की आवाज सुनकर मोनू चौंकता है। यह आवाज़ न जाने कितनी पुरानी लग रही थी जैसे सदियों से इंतजार कर रही हो कि कोई उसे फिर से महसूस करे।
मोनू असमंजस में है लेकिन साहस जुटाकर कहता है, “मैं… मैं मोनू हूँ। दादी का पोता। आप कौन हैं?”
पानदान हँसता है, “मैं तुम्हारी दादी का साथी हूँ, पर मैं केवल एक चीज नहीं। मैं उनकी वे बातें हूँ जो उन्होंने कभी किसी से साझा नहीं की। मैं उनके दर्द और सुख के वो लम्हे हूँ जो उन्होंने मुझमें समेटे हैं। मैं उनके आँसू हूँ, उनकी हँसी हूँ। क्या तू जानता है कि मैं यहाँ क्यों हूँ?”
मोनू हैरान होकर कहता है, “मुझे तो बस यह जानने की जिज्ञासा थी कि आख़िर आप में ऐसा क्या है जिसने दादी को आपसे बांधे रखा।”
पानदान धीमी आवाज़ में कहता है, “तेरी दादी ने मुझे ऐसे वक्त में अपनाया था, जब उन्हें किसी इंसान से ज़्यादा एक साथी की ज़रूरत थी। मैं उनकी ज़िंदगी की कई कहानियों का गवाह हूँ, पर हर कहानी इतनी साधारण नहीं। कुछ कहानियाँ तो समय के पर्दे में छुपी हैं जिनसे पर्दा हटाना आसान नहीं है।”
पानदान के भीतर छिपी कहानिययाँ धीरे-धीरे मोनू के सामने प्रकट होने लगती हैं। वो देखता है कि जब दादी अपने पहले बेटे को खो चुकी थीं तब वो अपने आँसुओं को इस पानदान में समेटा करती थीं। जब घर में किसी ने उनकी बातों पर ध्यान नहीं दिया तब उन्होंने इस पानदान को अपना साथी मान लिया। मोनू को इस बात का एहसास होता है कि यह पानदान केवल एक वस्तु नहीं बल्कि एक ऐसा ब्रह्मांड है जिसमें दादी की भावनाओं का हर रंग समाया है।
अचानक, पानदान कहता है, “तू जानता है कि मैंने दादी से क्या वादा किया था?”
मोनू की जिज्ञासा बढ़ती है, क्या वादा?”
“जब तक दादी का कोई अपना उनके दु:खों को समझ नहीं पाएगा, तब तक मैं उनकी कहानियों का गवाह बना रहूँगा। लेकिन अब तू यहाँ है…उनकी कहानियाँ सुनने को, उनकी भावनाओं को समझने को। शायद मेरा यह आख़िरी संवाद है, “पानदान की आवाज़ में एक अजीब सी विह्वलता थी।
जैसे ही मोनू पानदान के भीतर और गहराई में झाँकता है, उसे एक अलग प्रकार की स्मृति दिखती है। उसे याद आता है कि एक बार उसकी दादी ने उसे बताया था कि इस पानदान में एक ऐसी सुपारी रखी है जो केवल दु:ख के पलों में खिलती है। यह सुनते ही मोनू का ध्यान उस सुपारी की ओर जाता है जो अब धीरे-धीरे पानदान में उभरने लगती है। सुपारी का रंग गहरा लाल होता है, मानो वो पीढ़ियों के दुख और संघर्ष की प्रतीक हो।
मोनू चौंकता है, “ये क्या है? दादी ने मुझे इसके बारे में कभी नहीं बताया।”
पानदान बताता है, “यही वो सुपारी है, जो हर दुख के समय में दादी को साहस देती थी। इसका स्वाद कड़वा है पर इस कड़वेपन में भी एक मिठास है जो केवल उन्हीं को महसूस होती थी जो इसे समझते थे।”
मोनू की आँखों में अब आँसू हैं। वो महसूस करता है कि पानदान केवल समय के साथ बंधी कहानियाँ नहीं बल्कि उनके आगे के संघर्ष का प्रतीक भी है। तभी, पानदान उसे एक ऐसी झलक देता है जो भविष्य की है। वो देखता है कि कुछ समय बाद उसके जीवन में एक ऐसा पल आएगा जहाँ उसे अपनी दादी के इस संघर्ष और साहस की जरूरत पड़ेगी।
“तुझे इस सुपारी की कड़वाहट को समझना होगा, मोनू” पानदान कहता है।
“क्योंकि जब समय कठिन हो तो यह कड़वा स्वाद ही तुझे उस मिठास की याद दिलाएगा जो सच्चे सुख से आती है।”
मोनू पानदान के साथ हुई इस पूरी बातचीत के बाद अपने आप को पूरी तरह बदला हुआ महसूस करता है। उसके लिए भी अब ये पानदान केवल एक वस्तु नहीं रहा, बल्कि जीवन के दर्शन का एक प्रतीक बन गया था। वो धीरे-धीरे पानदान को बंद करता है और मन ही मन कहता है – “दादी, मुझे पता है अब कि इस पानदान में क्या है। मैं इस पानदान को अब अपनी जीवन यात्रा का हिस्सा बनाऊंगा, ताकि आपके संघर्ष का छिपा हुआ कड़वा और मीठा स्वाद मेरे हर कदम में महसूस होता रहे।”
पानदान बंद होते ही मोनू को दादी मुस्कुराती हुई दिखती है और उनकी छवि धीरे-धीरे धुँधली होने लगती है। ये देखने के बाद मोनू पानदान को कसकर सीने से लगा लेता है, मानो उसकी दादी उसके भीतर समा गई हों।
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नवपल्लव के लिए लेखक द्वारा चुनी कहानियों में से एक कहानी 'पानदान'
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