कृपया प्रतीक्षा करें...
✍️ लेखन: आतिश कुमार
“अबे यार ये साला कुछ लेखक सिर्फ प्यार-व्यार के बारे में ही क्यूँ लिखते हैं?”
“बिकता होगा ना प्यार!”
अंग्रेजी की एक को नॉवेल हाथ में पकड़े आशीष, प्यार के कांसेप्ट से ऊबे हुए आयुष से कुछ जवाब चाह रहा था। मगर आयुष आशावादी जवाब की जगह एक निराशावादी जवाब देकर आगे निकल जाता है। आशीष अब सोच रहा है कि आखिर क्या कोई लेखक एक ही रचना-पद्धति पर सिर्फ इसलिए लिखता है क्योंकि उसकी बिक्री ज्यादा हो रही है! लेखक का आज के जमाने में व्यवसायी की तरह सोचना कितना वाजिब है?
आशीष मन में यह सब सोचते हुए पार्किंग से यूनिवर्सिटी के गेट की तरफ जा रहा होता है। वो लखनऊ यूनिवर्सिटी में भूगोल से स्नातक कर रहा है। आयुष भी आशीष के आगे आगे चल रहा होता है। आयुष जहां छोटे कद का थोड़ा मोटा-सा, गोरे रंग का था तो वही आशीष उससे थोड़ा लंबा और काफी पतला। दोनों के बाल लंबे लंबे थे, कई दफा तो यूँ हुआ कि पीछे से देख कुछ यूनिवर्सिटी के लड़के सीटी बजा दिया करते थे। हमारे समाज की इस विचारधारा को दोगलिस्ट विचारधारा कहते हैं। समाज को सिर्फ अपना अच्छा-भला ही दिखता है। जब कोई उसके बनाए खांचे से कुछ अलग करता है तो समाज या तो सीटी बजाता है या फिर अपने आप को अलग कर लेता है।
खैर, दोनों भूगोल की कक्षा के दरवाजे पर पहुँचते हैं। वहाँ दरवाजे पर बड़ी-बड़ी आँखें लिए एक लड़की इंतजार कर रही होती है। वो लड़की परिधि है, आयुष की प्रेमिका। बात यह है कि आयुष ने भूगोल इसलिए नहीं लिया था क्योंकि उसका यह मनपसंद विषय था। उसने यह विषय इसलिए लिया था क्योंकि बात दोस्ती की थी। आशीष पढ़ने में तेज था,परिधि भी तेज थी लेकिन आयुष सबसे अलग था, उसका मन स्कूल से ही पढ़ाई में कम और परिधि में ज्यादा था। तीनों ने एक ही स्कूल से मानविकी की पढ़ाई पूरी की और साथ में ही यूनिवर्सिटी का फॉर्म भरा। आयुष का भूगोल में ना होकर इतिहास में हो गया,वही परिधि का भूगोल में हुआ, बाकी आशीष को वहाँ जाना था जहां आयुष जाएगा तो उसका इतिहास और भूगोल दोनों में हो गया था। लेकिन आयुष ने आशीष को कहा कि उसके पास कोई ऑप्शन नहीं है और परिधि का भी क्लास में कोई ख्याल रखने वाला होना चाहिए। इसलिए आशीष से उसने कहा कि तुम भूगोल ले लो ताकि परिधि की मदद कर सको और वैसे भी यूनिवर्सिटी तो एक ही है ना। प्यार कभी-कभी दोस्ती पर भारी पड़ जाता हैं या दोस्ती की शुरुआत ही शायद किसी प्यार के एक भाव से होती होगी।
कक्षा के बाहर आयुष और परिधि गले मिल रहे होते हैं, वही आशीष दोनों को देख रहा होता है। यह देख परिधि बोलती है,
“अर्रे आशीष, अब तो कॉलेज का भी आखिरी साल है। अपने लिए कोई तो ढूँढ ले।”
आशीष नजरें नीचे कर बोलता है,
“तुम लोग हो ना यार। अब और किसी की मुझे क्या जरूरत!”
परिधि मज़े लेते हुए कहती है,
“हाँ, मैं तो हूँ ही..”
यह सुन आयुष चिढ़ते हुए कहता है,
“अच्छा...”
परिधि आशीष की तरफ आँख मारते हुए कहती है,
“धुँआ-धुँआ सा नही हो गया माहौल? क्यों आशीष!”
आशीष मुँह दबा के हँसने लगता है। यह देख आयुष आशीष के पेट पर मारते हुए कहता है,
“ज्यादा मज़े ना लो बेटा, सुट्टा चाय हमारे साथ ही पीना है”
यह बोल आयुष अपनी इतिहास की कक्षा में चला जाता है और आशीष परिधि अपनी भूगोल की कक्षा में।
शाम होती है, तीनों यूनिवर्सिटी की पार्किंग में मिलते है।
आयुष कहता है -
“आशीष भाई, आज तुम परिधि के साथ सुट्टा चाय पी लो..”
यह सुन परिधि आयुष के गालों को खींचते हुए कहती है,
“बेबी, सुबह मज़ाक किये थे हम। तुम अभी भी नाराज़ हो?”
आशीष भी साथ में बोलता है,
“हाँ भाई, वो बस मज़ाक था।”
आयुष सबकी बातों को नकारते हुए कहता है,
“वो बात नहीं है, मुझे थोड़ा काम है तो जाना है जल्दी..”
इतना बोल आयुष अपनी स्कूटी चालू करता है और बाय बोल के चला जाता है। यहाँ परिधि का मूड थोड़ा खराब हो जाता है।
आशीष परिधि को उदास देख उसे कहता है,
“अबे तुम ऐसे उदास ना हुआ करो, मुझे प्यार हो जाता है..”
परिधि आशीष के जूते पर अपने जूते से मारते हुए कहती है,
“तो कर लो प्यार...”
आशीष इस जवाब से हक्का बक्का रह जाता है। उसे इस जवाब की उम्मीद नहीं होती। वो कुछ नहीं कहता है थोड़ी देर बाद परिधि ही बोलती है,
“चले फट्टू...चाय सुट्टा पीने!”
आशीष दबी मुस्कान में हामी भरता है और दोनों यूनिवर्सिटी के बाहर लगी एक टपरी पर चाय सुट्टा पीते है।
आधी कप चाय खत्म होने के बाद सुट्टे का कश लेते हुए
परिधि बोलती है,
“हम जानते है...”
आशीष परिधि के हाथ से सुट्टा लेते हुए पूछता है,
“क्या जानती हो..”
“ यही की तुम मुझे स्कूल टाइम से चाहते हो..”
यह सुन आशीष के मुँह से चाय गिर जाती है और वो डरते हुए कहता है,
“क्या बकवास कर रही हो। मरवाओगी क्या तुम!”
“बेटा, हमें सब पता है बस तुम ये बताओ कि तुमने मुझसे बोला क्यों नहीं कभी...”
इस से पहले की आशीष कुछ कहता, टपरी पर बजते गाने की आवाज़ बढ़ जाती है और गाने के लिरिक्स आशीष का जवाब दे जाते है,
“ख़यालो में लाखों बातें यूँ तो कह गया
बोला कुछ ना तेरे सामने...”
आशीष ने चाय सुट्टा खत्म करी और बस पकड़ने चल दिया। परिधि भी उसके पीछे पीछे चल दी। परिधि बार बार आशीष से पूछती रही,
“बताओ ना क्यों नहीं इज़हार किया...”
आशीष सब अनसुना कर बस में बैठ गया और घर की तरफ बिना परिधि को बाय बोले रवाना हो गया।
घर पहुँचने तक दोनों ही सोचते रहे एक दूसरे के बारे में। परिधि ने सोचा कि कही उसने कोई ज़ख्म तो नहीं कुरेद दिया, वही आशीष यह सोच रहा था कि कही ये राज़ उसकी दोस्ती में तो दरार नहीं ला देगा। कुछ देर के विमर्श के बाद आशीष अपना फ़ोन निकालता है और परिधि को एक मैसेज लिखता है,
“देखों यार परिधि मैं अपनी भावनाओं की वजह से आयुष के संग दोस्ती में दरार नहीं ला सकता। मैं तुम्हे पसंद करता हूँ मगर आयुष ने मेरी माँ के गुज़र जाने के बाद से ही बहुत कुछ किया है मेरे लिए और मैं उसका भरोसा नहीं तोड़ना चाहता।”
इस से पहले की वो सेंड का बटन दबाता, वहाँ से परिधि का मैसेज आता हैं,
“सॉरी आशीष...”
आशीष सेंड का बटन दबा के फ़ोन जेब में रख लेता है क्योंकि उसका घर आ गया था।
रात होती है और खाना खाने के बाद, आशीष अपना फ़ोन उठाता है। उसमें परिधि के मैसेज आये होते है, परिधि ने मैसेज में लिखा हैं,
“आशीष पसंद और नापसंद की बात नहीं है। तुम्हारा यूँ अपनी फीलिंग्स को दबा के रखना अंदर से जला देगा। मैं बस यह चाहती थी कि एक दफा तुम सब बोल दो...”
आशीष मैसेज पढ़ उसका जवाब लिखता है,
“परिधि मैं कुछ नहीं कर सकता। तुम्हारे लिए यह मेरी फीलिंग्स मात्र फीलिंग्स होगी मगर मेरे लिए यह शिव के गले में अटके हलाहल विष सा है। मैं इसको बाहर ना तो निकाल सकता हूँ और ना ही पूरा अंदर रख सकता हूँ।”
परिधि यह पढ़ खुद को रोक नहीं पाती और आशीष को फ़ोन लगा देती है। यह पहली दफा हो रहा था कि सिर्फ परिधि आशीष को कॉल कर रही है वरना इससे पहले तक आयुष के साथ कॉन्फ्रेंस कॉल पर ही बात होती थी।
परिधि का कॉल आशीष उठाता है, परिधि बिना कुछ सुने बोलने लग जाती है,
“आशीष जैसे तुम्हारे लिए हलाहल विष है तुम्हारी फीलिंग्स, ठीक वैसे ही आयुष के संग मेरा रिश्ता भी है...”
यह सुन आशीष परिधि को रोकते हुए बोलता है,
“ऐसा क्या हुआ? तुम दोनों साथ में इतने परफेक्ट तो लगते हो..”
“कुछ भी परफेक्ट नहीं है दोस्त..”
“क्या हुआ बताओ तो! मैं आयुष से बात करू?”
परिधि भारी गले से कहती हैं,
“यार, तुझे तो पता है कि हमको 5 साल हो जाएगा इस साल रिलेशनशिप में रहते हुए।”
“हाँ तो?”
“तो ये कि आयुष मुझे पिछले 6 महीने से प्यार के नाम पर सिर्फ सेक्स करने के लिए फ़ोर्स कर रहा है...”
“इसमे दिक्कत क्या है? कर लो ना..”
“दिक्कत सेक्स को लेकर नहीं है। मेरी दिक्कत है आयुष की मानसिकता को लेकर। उसने मुझसे कल रात यह कहा कि दो लोग प्यार इसीलिए करते है ताकि एक दिन उन्हें सेक्स करने का मौका मिले...”
“सीरियसली! ये बोला उसने?”
“हाँ! मुझे बस इसी बात से दिक्कत है...”
आशीष यह सुनने के बाद रुकता नहीं है और कॉन्फ्रेंस कॉल पर आयुष को लेने के लिए उसे कॉल करता है। आयुष कॉल नहीं उठाता है, परिधि आशीष से पूछती है,
“होल्ड पर क्यों रखा था...”
आशीष बताता है,
“अर्रे वो आयुष को ले रहा था कॉल पर। पता नहीं क्यों उसने कॉल नहीं उठाया।”
“काम करने गया था ना तो शायद थक के सो गया होगा..”
“हम्म”
आशीष परिधि को समझाते हुए बोलता है,
“देखो यार, मैं उसे समझाऊँगा ताकि तुम दोनों के बीच सब सही हो जाए।”
परिधि यह सुन कहती है,
“कब तक अपनी फीलिंग्स और मुझे इग्नोर करोगे, आशीष!”
इस सवाल को अनसुना कर आशीष फ़ोन काट देता है।
आशीष अनसुना तो कर देता है मगर वो सवाल उसके मन में घर कर जाता है। वो फिर से फ़ोन उठाता है और परिधि को एक मैसेज लिखने लग जाता है।
पता है मॉडर्न डे की प्रेम कहानियों की सबसे अच्छी बात क्या है? इस मोबाइल वाली दुनिया में जब आप कुछ बोल नहीं पाते तो आपके पास वो ही चीज़ लिख के तुरंत कह देने का एक ऑप्शन रहता हैं। आवाज़ का भारीपन या मन का खालीपन मैसेज में कोई भी पता नहीं कर पाता और बिना हिचके या डरे बात भी पूरी कह दी जाती हैै।
खैर,आशीष परिधि के उस सवाल से परेशान होकर मैसेज लिखता है,
“देखो परिधि, तुम भी भूगोल की छात्र हो और मैं भी। अभी दुर्भाग्य यह है कि मैं चाँद हूँ और तुम पृथ्वी। पृथ्वी के चक्कर चाँद लगा सकता है मगर पृथ्वी को चक्कर लगाने के लिए सूर्य की ज़रूरत है। फिलहाल तुम्हारे जीवन का सूर्य आयुष हैं। और वो हैं तो हम दोनों रोशन है।”
इस मैसेज को भेजने के बाद आशीष बहुत देर तक इंतज़ार करता है। परिधि का कोई मैसेज नहीं आया। वो इस उम्मीद में सो जाता है कि उसने पढ़ लिया होगा और कल सुबह इस बारे में यूनिवर्सिटी में बात कर लेंगे।
सुबह होती है, आशीष समय से पहले ही बिना आयुष को फ़ोन करें यूनिवर्सिटी पहुँच जाता हैं। परिधि अक्सर जल्दी आ जाती थी मगर आज वो अभी तक नहीं आई।वो आयुष और परिधि को फ़ोन लगाता है मगर कोई भी फ़ोन नही उठाता। आशीष इधर उधर परेशान होकर घूम ही रहा होता है कि तभी आयुष की क्लास का एक लड़का आशीष को देख बोलता है,
“भाई तुम यहाँ क्या कर रहे हो?”
आशीष गुस्से में बोलता है,
“साले, यूनिवर्सिटी में क्या करेंगे...”
“अर्रे मेरे कहने का मतलब वो नही था।”
“ दिमाग ना खाओ सुबह सुबह...”
“ भाई तुम्हें पता नहीं है?”
“क्या नहीं पता?”
“ भाई यही कि कल शाम में आयुष का टेढ़ी पुलिया के पास एक्सीडेंट हो गया और वो अवध अस्पताल में भर्ती है...”
यह सुन आशीष के पैर और हाथ काँपने लगते है और वो बिना देर किए सीधा दौड़ते हुए बस पकड़ने चला जाता हैं। बस में बैठे वो रात में परिधि को भेजें उस आखिरी मैसेज को पढ़ रहा होता हैं। रोशनी के कम होने का उसे एहसास हो रहा होता हैं। अब वो जल्दी कैसे भी बस अवध अस्पताल पहुँचना चाहता हैं।
अस्पताल पहुँचते ही उसे बाहर परिधि मिल जाती हैं। परिधि की आँखे लाल थी और आँखों के नीचे काले घेरे थे। आशीष को देखते ही परिधि उसके गले लिपट रोने लगती है और रोते रोते आशीष से कहती है,
“मेरी, तुम्हारी, हमारी रोशनी चली गई आशीष...”
आशीष को अब कुछ समझ नहीं आ रहा होता हैं। दिन के उजाले में उसे अंधेरी रात सा महसूस हो रहा होता है।
परिधि एम्बुलेंस की तरफ इशारा करती है मगर आशीष को कुछ नहीं दिख रहा होता। परिधि को अपने से दूर करते हुए आशीष कहता हैं,
“तुमने मुझसे पूछा था ना कि कब तक इग्नोर करूँगा। तो सुन लो, जब तक उस छोर से रोशनी नहीं आती तब तक।”
यह सुन परिधि आशीष के हाथों को पकड़ती है और कहती है,
“आशीष उम्मीद का होना और उम्मीद का टूटना दोनों ज़रूरी है मगर हमेशा के लिए उम्मीद में जीना काफी मुश्किल हैं।”
आशीष को कुछ सुनाई नहीं दे रहा होता है बस परिधि के होंठ चलते दिख रहे होते हैं। उसे ऐसा लग रहा था मानो दोस्ती और प्यार के बीच में एक रात खड़ी हो, जिसकी सुबह इस बात पर निर्भर करती है कि आज नींद आएगी या फिर ज़िन्दगी,दोस्ती और प्यार के बीच में रतजगा हो जाएगी।
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