कृपया प्रतीक्षा करें...
✍️ लेखन: आनन्द कुमार
अंतिम प्रेमपत्र
नदी पार कर जाने से
नावों को किनारे लगाने से
हर बार मंजिलें नहीं मिलतीं
फैसले, देरी से लिए हों
या कि समय बचाने की जल्दबाजी में
न्याय करने वाले निर्णय भी सदैव इकतरफा ही रहे हैं
तुम्हारी शिकायतें रहीं
कि मैंने नहीं लिखी कोई कविता तुम्हारे लिए
शायद
कौन सी कविता तुम्हारे लिए थी
किन कविताओं में सिर्फ तुम ही थीं
यह बताना मुझसे रह गया
और ये जताना भी कि
मैंने सबसे पहले नहीं चाहा तुमको, सच है
लेकिन चाहा तुमको सबसे ज्यादा
माफ़ीनामों से रिश्ते नहीं चलते
स्वीकारोक्तियां हर बार सही नहीं होतीं
सही वक्त पर सही बात मान लेना
या कि गलत वक्त पर गलती स्वीकार कर लेना
यह चुनना मुझसे रह गया
अब, जबकि
तुम्हारे लिए चिट्ठियों के पते बदल गए हैं
मैं फिर भी तुम्हें लिखना चाहूंगा चिट्ठियाँ
कि तुम्हारा अधिकार है यह जानना
मेरी अधलिखी चिट्ठियों पर नाम किसका था
इसे स्वीकारोक्ति कहो या अंतिम प्रेमपत्र
लेकिन यह कविता सिर्फ तुम्हारे लिए है।
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