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विद्या और विनय

✍️ लेखन: कपिल मिश्रा

 

​विनय का पाठ जो देती, वो कटुता सिखा रही है,

अजब ये दौर है, विद्या विमुखता सिखा रही है।

 

​झुकना तो भूल बैठे हैं, ऊँचे पदों की ख़ातिर,

डिग्री अब इंसान को बस उग्रता सिखा रही है।

 

​होड़ है कि छीन लें निवाला हर किसी के मुँह का,

इल्म की ये प्यास अब तो क्रूरता सिखा रही है।

 

​सलीक़ा बात करने का रहा नहीं अब किसी में,

किताबी ज्ञान अब 'अहं' की प्रखरता सिखा रही है।

 

​तहज़ीब के पन्ने न जाने कहाँ खो गए 'दोस्त',

आज की तालीम तो सिर्फ़ जड़ता सिखा रही है।

 

नवपल्लव बुक्स की वेबसाईट के लिए रचनाकार द्वारा चयनित कविताओं में से एक कविता । 


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