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निर्मल वर्मा: अपने रचना संसार में उपस्थित एक लेखक

निर्मल वर्मा: अपने रचना संसार में उपस्थित एक लेखक

निर्मल वर्मा: अपने रचना संसार में उपस्थित एक लेखक

✍️ लेखन: अभिषेक शुक्ल

           "कलाकार दुनिया को छोड़ता है, ताकि उसे अपने कृतित्व में पा सके।" निर्मल ने अपने लेखन से जो दुनिया बनाई, वास्तव में वे उस दुनिया में अपने होने से ज्यादा उपस्थित हैं।

          आज निर्मल की पुण्यतिथि है। आज ही के दिन साल 2005 में, 3 दिन तक कोमा में रहने के बाद, वे अनंत काल के लिए अपने रचना संसार में समा गए थे। अपनी लगभग सभी रचनाओं, लेखों, संस्मरणों में वे ख़ुद को लेखक से ज़्यादा एक पाठक ही बताते रहें, जिसके बारे में विनीत गिल अपनी किताब Here and Hereafter: Nirmal Verma's Life in Literature में बताते हैं कि वे लंबे समय तक वेंटिलेटर पर रहें। उस दौरान कुछ ज़रूरी दवाओं के अलावा किताबें ही उनके इर्द-गिर्द मेज पर पड़ी रहतीं और वेंटिलेटर से उतरते ही उन्होंने J. M. Coetzee की दो किताबें पढ़ डालीं।

          निर्मल क्षणवाद के लेखक रहे हैं। उनके पात्र, जब कहानी में आते हैं, तो न किसी पूर्वाग्रह के साथ, न ही भविष्य की किसी चिंता के साथ। वे जब, जहाँ, जैसे आते हैं, बस वहीं के होकर रहते हैं।

          साल 2011 में, चाचा की अलमारी में 'अंतिम अरण्य' रखी देख, यकायक पढ़ने का मन हुआ था। वे लंबी बीमारी के दिन थे, ऐसे में किताबों से बेहतर क्या हो सकता था। उस समय 'अलजेब्रा' से ज़्यादा उबाऊ 'अंतिम अरण्य' लगी थी। फिर 2016 में भी वही हाल रहा। लेकिन कोविड के दिनों में जब तीसरी बार 'अंतिम अरण्य' पढ़ा, तो जान पाया कि कला और कलाकृति में जो सूक्ष्म अंतर होता है, उसे समझने के लिए साधना की आवश्यकता पड़ती ही है। फिर 'एक चिथड़ा सुख' पढ़कर बहुत दिन बेचैन रहा। बाद में जब असीम भइया से किताब पर चर्चा हुई, तब जाकर वह बेचैनी कम हुई। जिसमें लगभग दो साल लगे।

          निर्मल अद्भुत लिखते हैं, अतुलनीय, अद्वितीय। उनके लेखन से पता चलता है कि साहित्यिक नवाचारों और प्रयोगों में हम कैसे यूरोप के देशों से पचासों साल पीछे हैं। वे न केवल एक संवेदनशील और सहज लेखक, बल्कि एक कुशल अनुवादक भी रहे, जिन्होंने चेक, जर्मन और तमाम यूरोपीय भाषाओं की किताबों का अनुवाद सीधे हिंदी में किया।

          इन दिनों निर्मल द्वारा अनूदित चेक कहानियों का संग्रह 'खेल-खेल में' पढ़ रहा हूँ, जिसमें वे एक अद्भुत बात लिखते हैं कि हमें अपने देश में भाषाविदों की एक योग्य टीम तैयार करनी चाहिए, जो अन्य देशों में होने वाली नवीन और दिलचस्प प्रवृत्तियों और नव-प्रकाशित पुस्तकों को बार-बार सूँघते रहें और फिर ऐसी पुस्तकों का चयन करें, जिनका अनुवाद बिना विलंब सीधे हिंदी में किया जा सके, जिससे हम आज तक जो अंग्रेजी अनुवादकों की चयन-रुचि की गुलामी करते आ रहे हैं, उससे छुटकारा पा सकें।"

          निर्मल का एक वाक्य है, जो साहित्य को पढ़ने और समझने की पूरी प्रक्रिया को अपने भीतर समेट लेता है -"साहित्य हमें पानी नहीं देता, वह सिर्फ हमें अपनी प्यास का बोध कराता है। जब तुम स्वप्न में पानी पीते हो, तो जागने पर सहसा एहसास होता है कि तुम सचमुच कितने प्यासे थे।"

          शायद निर्मल को पढ़ना भी कुछ ऐसा ही है। हम किताब के पन्ने पलटते हुए यह सोचते हैं कि हम कुछ जान रहे हैं, कुछ समझ रहे हैं, लेकिन किताब खत्म होने के बाद कई बार पता चलता है कि हमारे भीतर कुछ ऐसा बचा रह गया है, जिसे हम अब तक पहचान भी नहीं पाए थे। शायद इसीलिए कुछ किताबों पर बातचीत ज़रूरी हो जाती है, कुछ किताबें बार-बार पढ़नी पड़ती हैं और कुछ किताबों से बाहर निकलने में बरसों लग जाते हैं।

          निर्मल को पढ़ते हुए यह भी लगता है कि जीवन को समझने के लिए ज़रूरी नहीं कि हम हमेशा किसी निष्कर्ष तक पहुँचें। कुछ अनुभव ऐसे होते हैं, जिन्हें अपने भीतर बने रहने देना चाहिए। कुछ बेचैनियाँ ऐसी होती हैं, जिन्हें दूर करने के बजाय उनके साथ रहना सीखना पड़ता है। और शायद साहित्य का काम भी यही है कि वह हमारे भीतर उन सवालों के लिए जगह बनाए, जिनके जवाब हमारे पास नहीं हैं।

          निर्मल चले गए, लेकिन उनके जाने से वह दुनिया खत्म नहीं हुई, जिसे उन्होंने अपने शब्दों से बनाया था। आज भी जब उनकी कोई किताब उठाता हूँ, तो लगता है कि वे कहीं गए ही नहीं। वे अपने पात्रों में, अपने अधूरे वाक्यों में, अपनी चुप्पियों में और उन तमाम सवालों में मौजूद हैं, जिन्हें पढ़ते हुए हम अपने भीतर लेकर लौटते हैं। शायद किसी लेखक का इससे बड़ा होना क्या होगा कि उसकी अनुपस्थिति में भी हम उसे पढ़ते हुए उसके साथ होने का अनुभव कर सकें।

 

एक पाठक एवं युवा लेखक 

- अभिषेक शुक्ल

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