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रात, नींद, मृत्यु, संताप, प्रायश्चित, युद्ध, दंगे, अनुपस्थिति, अंधविश्वास, महामारी, प्रकृति, उम्मीद, प्रेम, अलगाव, हिंसा, राजनीति—सरीखे की-वर्ड्स को केंद्रीय बनाती अरमान आनंद सिंह की कविताओं की यह पहली किताब पहली ही नज़र या कहें पहले ही पाठ में अपने विषय-वैविध्य से चकित-विचलित करती है। रचना-उत्पादन और प्रकाशन-आक्रांत इस समय में अरमान का कवि अति प्रकाशन से परहेज़ करते हुए, उसके प्रति उदासीन रहते हुए, रचना-संबंधित आत्म-प्रचार से बचते हुए; संपादकों-उप संपादकों, ब्लॉग मॉडरेटरों, प्राध्यापकों, प्रायोजकों, आयोजकों को मुँह न लगाते हुए या उन्हें विनम्रता से या डपटकर मना करते हुए, अपनी दैनिकता में अपने अध्यवसाय को लेकर सदा सशंकित रहते हुए बेहतर कविताएँ रच सकने के आत्म-विश्वास से समृद्ध है। यह कवि जब यह दर्ज करता है कि रखी जा चुकी क़लम लाश से अधिक भारी होती है... तब वह कहते-बोलते रहने की ज़रूरत को महसूस कर रहा होता है। यह ध्यान देने वाली बात है कि कहने की व्यर्थता भी कहने की ज़रूरत ख़त्म नहीं कर पाती है। इसलिए ही इस ज़रूरत का ज्ञान-संज्ञान सब समय व्यवहार में ले सकने योग्य है। इस अत्यंत संक्षिप्त भूमिकानुमा प्रवचन के प्रकाश में अरमान की कविताओं पर ज़्यादा वाक्य नहीं हैं। दरअस्ल, साहिब-ए-किताब होने जा रहे कवियों की ज़्यादा प्रशंसा नहीं करनी चाहिए; तब तो और भी नहीं जब प्रशंसा के अतिरिक्त उस कवि ने अपने आस्वादक-आलोचक के निकट और कोई विकल्प न छोड़ा हो। - अविनाश मिश्र
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| Writer/Author | अरमान आनंद |
| ISBN | 9788197045493 |
| Edition | First |
| Publisher | Hindisthan Prakashan |
| Binding Type | Paperback |
| Language | Hindi |
| Weight | 200 g |
| Dimensions | 22 x 14 x 1 |
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