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Roohnama (रूहनामा) - Satish Kumar Roohdar - poetry - Kohbar Prakashan

Roohnama (रूहनामा) - Satish Kumar Roohdar - poetry - Kohbar Prakashan

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M.R.P.: ₹249
Description:

रूहनामा की कविताएँ इस शोर भरे समय में आदमी के भीतर बची हुई आख़िरी मनुष्यता की धीमी, लेकिन जिद्दी आवाज़ हैं। सतीश कुमार 'रूहदार' अपने शब्दों से कोई मंच नहीं सजाते, वे सीधे उस अँधेरे में उतरते हैं जहाँ स्त्रियाँ अब भी कैद हैं, लोकतंत्र अब भी भूखा है, प्रेम अब भी निर्वासित है और आदमी अपनी ही टूटनों के मलबे में खड़ा खुद को खोज रहा है। इन कविताओं में नारा नहीं है, मगर प्रतिरोध है। चीख़ नहीं है, मगर ऐसी चुप्पी है जो देर तक पीछा करती रहती है। कई कविताएँ पढ़ते हुए लगता है जैसे किसी ने हमारे समय की नस पर हाथ रख दिया हो। रूहनामा सिर्फ़ कविताओं का संग्रह नहीं, यह हमारे दौर की थकी हुई आत्मा का बयान है। यह किताब पढ़ी ही नहीं जाती बल्कि भीतर कहीं घटित होती है। नई हिंदी के इस नए कवि का स्वागत हर पाठक को करना चाहिए। - प्रशांत सागर (कवि एवं किताबगंज के संस्थापक)

Product Information:
ISBN: 9788198587701
Edition: 2026
Publisher: Kohbar Prakashan
Binding: Paperback
Language: Hindi
Product Code: KP0003
Weight: 180 g
Dimensions: 22 x 14 x 1
Availability: In Stock
Quantity:
Writer/Author सतीश कुमार 'रूहदार'
ISBN 9788198587701
Edition 2026
Publisher Kohbar Prakashan
Binding Type Paperback
Language Hindi
Weight 180 g
Dimensions 22 x 14 x 1
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Muskan khanna
22-06-2026 08:26:58

इस किताब के नाम से ही साफ पता चलता है कि यह 'रूह' यानी हमारी आत्मा का एक बेहद खूबसूरत दस्तावेज़ है। आज की इस भागदौड़ भरी और तनावपूर्ण जिंदगी में, जहाँ हम अक्सर बाहरी दुनिया की चकाचौंध में खुद को और अपनी आंतरिक शांति को पूरी तरह भूल जाते हैं, वहाँ यह किताब एक ठंडी हवा के झोंके की तरह सुकून देती है। 'रूहनामा' को पढ़ने का एक और मुख्य कारण इसकी बेहद सरल, सहज और आम बोलचाल की भाषा है। लेखक ने भारी-भरकम और कठिन शब्दों का प्रयोग करने के बजाय ऐसे सीधे और सच्चे शब्दों का चुनाव किया है जो बिना किसी बनावट के सीधे पाठक के दिल में उतर जाते हैं। इसे पढ़ते हुए बार-बार ऐसा महसूस होता है जैसे कोई अपना बहुत पुराना दोस्त आपके पास बैठकर आपके सुख-दुख, प्रेम और जीवन के सबसे निजी अनुभवों को बहुत प्यार से साझा कर रहा हो। अंत में, यह कहा जा सकता है कि 'रूहनामा' सिर्फ कागज के पन्नों का संग्रह नहीं है, बल्कि यह खुद से दोबारा मुलाकात करने का एक जरिया है। यदि आप मानसिक शांति की तलाश में हैं, या अपने जीवन के उलझे हुए सवालों के बीच कुछ पल सुकून और ताजगी के बिताना चाहते हैं, तो यह किताब आपके लिए एक बेहतरीन हमसफर साबित होगी। इसे पढ़ते हुए आप न केवल लेखक के सुंदर और गहरे विचारों से रूबरू होंगे, बल्कि अपनी व्यस्त दिनचर्या में से कुछ समय निकालकर अपने खुद के वजूद को भी थोड़ा दुलार दे पाएंगे।।।।।।।

Agam Murari
28-06-2026 13:22:00

ये कोई समीक्षा नहीं है। क्योंकि मुझे समीक्षा करनी आती ही नहीं है। समीक्षा करना धैर्य का काम है और मेरे भीतर थोड़ा भी पेशेंस नहीं हैं। किताबों के नाम पर तो और भी नहीं। चाहें नई किताब पढ़ना हो या कोई किताब पढ़कर ख़त्म करना, के बाद भीतर एक कुलबुलाहट पैदा होने लगती है किताब पर बात करने की। मैं बिहार के जिस क्षेत्र से आता हूँ यहाँ आपकों मुश्किल से 10% लोग ही ऐसे मिलेंगे जो सिलेबस के बाद साहित्य में कोई गहरा रुचि रखते हों। रुहनामा रिश्तों, क्रांति, आब-ओ-हवा, किसी कस्बे या गलियों के किस्से जहां यादगार बचपन की किलकारी गूँज रही हो, किसी पिता के ऊँचे सपने और एक बेटे का फ़र्ज़ अदा करना हो अंततः किसी प्रेम प्रसंग की बात हो; मस्तिष्क के कैनवास पर खड़ा उतार देती है। कोई हर्ज़ नहीं कि किताब का नाम रुहनामा रखा गया है। ये हमारे रूह को भेदते हुए सीधे हमारे हृदय के तार को छेड़ देती है। नहीं! ये कोई कहानी की किताब नहीं, पर इसकी सारी कविताएं एक कहानी को जकड़े बैठी है। गोया जेएनयू को पढ़ते हुए मैं जेएनयू के ही कहीं आस-पास टहल-बुल रहा हूँ। जैसे वहाँ के प्रसिद्ध नाम-दुकानों को मैं एक साथ ही कागज़ पर उतरा हुआ देख रहा हूँ। मनो ये किताब अपनी एक दुनिया बसा रही हो। अगर प्रेम है तो विरह होना तय है, कष्ट है तो क्रांति भी होगी, दर्शक है तो अभिनेता का एंट्री निश्चित है। लेकिन......जिस राष्ट्र में राजनेता है वहां जननायक भी होना चाहिए। और जननायक हमें ही बनना होगा। मुझे विश्वास हैं इस किताब को पढ़ने के बाद आपके भीतर भी एक पात्र का जन्म होगा,,, और वो होगा जननायक का।

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