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ग़ज़लकार, विचारक
ग़ज़ल संग्रह :
तश्नगी का रास्ता (1994), विप्लवी प्रकाशन
सुबह की उम्मीद (2004), वाणी प्रकाशन
प्यास ही प्यास (2014), विप्लवी प्रकाशन
आलोचना :
दलित दर्शन की वैचारिकी, वाणी प्रकाशन
खण्डकाव्य :
प्रवंचना, विप्लवी प्रकाशन
लेखक पर जनाब वसीम बरेलवी की टिप्पणी
गुज़िश्ता दो-ढाई साल में विप्लवी जी शायराना सलाहियतों से तआरुफ ने उनकी सोच के रंगारंग मौसमों से कुछ इस तरह रूशनास कराया कि मुझे उनके शेरी तेवरों में एक मुस्कुराते भविष्य की आहट सुनाई देने लगी। ग़ज़ल का आलमगीर जादू अब किसी भाषा की मीरास न होकर सारी मानवता का आरजूनामा बन चुका है। विप्लवी जी जिस प्रकार हिन्दी संस्कार फूलों को उर्दू तहज़ीव की खुश्बू में बसाने का प्रयत्न कर रहे हैं उसने उनकी ग़ज़लिया शायरी को लाइके-तवज्जो बना दिया है। विप्लवी जी की आवाज़ खो जाने वाली आवाज़ नहीं। उनकी आवाज़ हवा का आवारा झोंका नहीं - नसीमे सुबह का वह नगमा है जिसका आज भी है और कल भी। अपने माहौल की बेबर्द सच्चाइयों, अपनी ज़ात की तह-दर-तह गहराइयों और अपने तज़रबों की रौशन इकाइयों को शेरी पैकर देना और ज़मीनी एहसास से जुड़े रहना उनकी काव्ययात्रा का वह असासा है जो उनके फन को नये आयाम देने में पूरी तरह सक्षम है। उपरोक्त निवेदन से सहमति के लिये विप्लवी जी के कुछ शेर हाज़िर हैं पढ़िए और मेरी तरह लुत्फ लीजिए-
अब सुना है जंगलों में शेर का है खौफ कम,
गाँव में लेकिन बिना बन्दूक के मत जाइये ।
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