कृपया प्रतीक्षा करें...
✍️ लेखन: सुधाकर
दिल चुराके यहीं पर है ठहरा हुआ
चोर चोरी किया और अपना हुआ
एक लड़की ने कैसी घड़ी बाँध दी
एक ही वक्त पर मैं हूँ अटका हुआ
एक घड़ी शाम को, वो मुझे छू गई
रेत सा ये बदन फिर निकलता हुआ
इश्क़ क्या चीज है पूछती वो मुझे
मैं खड़ा हूं, किताबें पलटता हुआ
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