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दफ़न आँगन

✍️ लेखन: विवेक कुमार

एक लकीर खिंची नक्शे पर

और सीने में उतर गई दरार बनकर

माँ कहती रही बरसों तक

‘घर वहीं है, बस द्वार बदल गया है।’

 

हम चलते रहे, चलते रहे

पीछे एक दुनिया को छोड़ते हुए

जैसे साँस तो छूटी पर

लेना उसे फिर भूल गए

 

सरहद ने सिर्फ़ मिट्टी नहीं बाँटी

बाँट दी यादों की वो डोर भी

आधी हमारे संग चली आई

आधी किसी आँगन में दफ़न रह गई वहीं

 

पूछा था एक रोज़ नानी से

‘कैसा था अपना वो घर?

वो कुछ बोली नहीं उस पल

सिर्फ़ ताकती रही आसमान की ओर

जैसे जवाब कहीं उसी में

खो गया हो बरसों पहले

 

आज भी ‘वतन’ सुनकर

दो सुरें गूँजती हैं भीतर

एक जो जी हुई थी कभी

एक जो सिर्फ़ सुनी हुई कहानी है

और मैं अब तक तय नहीं कर पाया

किस पर यकीन करूँ, किसे अपना मानूँ।

 

नवपल्लव बुक्स की वेबसाईट के लिए रचनाकार द्वारा चयनित कविता


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