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तुम्हारी ख़ुशबू

✍️ लेखन: विवेक कुमार

तुम्हारी ख़ुशबू 

सच कहूँ सुनो

अजीब-सा है सब कुछ

तुम्हारे जाने के बाद भी

ये तकिया

तुम्हारी ख़ुशबू छोड़ता नहीं

अलमारी में अब भी

तुम्हारे कपड़ों की जगह है

खाली पर भरी हुई-सी

और मेरा मन

आज भी तुम्हारे नाम पर

ठहर जाता है अचानक से

शाम तो किसी तरह

ढल ही जाती है

मगर रात होते ही

तन्हाई बातें करने लगती है मुझसे

और फिर

मैं तुम्हारी पुरानी तस्वीरें देखने लगता हूँ

बस ये याद रखने को कि

तुम सच में थीं

कोई ख़्वाब नहीं थीं। 

 

नवपल्लव बुक्स की वेबसाईट के लिए रचनाकार द्वारा चयनित कविता


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