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जब हर हँसी संदिग्‍ध थी (Jab Har Hansi Sandigdh Thi) - Parag Pawan [पराग पावन] - Poetry a Rajkamal

जब हर हँसी संदिग्‍ध थी (Jab Har Hansi Sandigdh Thi) - Parag Pawan [पराग पावन] - Poetry a Rajkamal

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Description:

‘मैंने जिसे देश समझकर प्यार किया वह विचारों की क़त्लगाह था।’ अपने आक्रोश और असहमति में पराग पावन जितने युवा हैं, अन्याय और शोषण की संरचना को समझने में उतने ही वयस्क। उनके इस पहले संग्रह में शामिल कविताओं का भावात्मक और भाषिक वैविध्य बताता है कि एक विधा के रूप में कविता को उन्होंने जितनी गम्भीरता से लिया है, वैसा कम ही युवा कवि करते हैं। स्मृतियों में बसी ‘चूल्हे की राख’ से आरम्भ होकर ‘कथा कहूँ कवि गंग की’ शीर्षक एक सुदीर्घ आख्यानपरक कविता तक उठनेवाला यह संग्रह उन हत्यारों की पहचान भी करता है जो कभी आपकी अस्मिता तो कभी असमर्थता पर आक्रमण कर बिना हथियार ही आपको संसार से नफ़ी कर देते हैं; और उन प्रातिभ चापलूसों को भी दिखाता है जो ‘दुखी किसी-किसी को, ख़ुश अधिकांश को करते हुए’ सब कुछ को अपने अनुकूल करने में तल्लीन हैं। पराग जहाँ ज़रूरी समझते हैं व्यंग्य को और जहाँ ज़रूरी समझते हैं करुणा को उसकी पूरी सम्भावना के साथ प्रयोग करते हैं। व्यक्ति और व्यवस्था, दोनों जगह निहित ख़तरों की पर्याप्त पहचान उन्हें हैं-‘गाँव 2020’ का अतियथार्थ हो या उस अध्यापक को याद करना जिसे बताना पड़ता है कि ‘प्रेम आदमी का अवैतनिक चिकित्सक है।’ ‘बेरोज़गार’ शीर्षक पराग की बहुत चर्चित कविता-शृंखला के अलावा न्यायाकांक्षी युवा चेतना के और भी आयामों को रेखांकित करने वाली कविताएँ इस संग्रह में मिलेंगी, और एक नागरिक मन की उदासी भी जिसे कोई धोखा नहीं देता, सिवा उसकी उम्मीदों के। साथ ही प्रेम के कंधे पर कुहनी टिकाए खड़ी उम्मीद भी यहाँ है-जहाँ शाम ख़त्म होती है/रात वहीं से शुरू नहीं होती/रात शुरू होती है तुम्हारे मेरा बाज़ू पकड़ने से/और उस बेआवाज़ वाक्य से/कि थक गए हो/चलो, घर चलें।

Product Information:
Writer/Author: पराग पावन
ISBN: 978-9360863333
Edition: First
Publisher: Rajkamal Prakashan
Binding: Paperback
Language: Hindi
Product Code: RP0006
Weight: 250 g
Dimensions: 22 x 14 x 1
Availability: In Stock
Quantity:

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Writer/Author पराग पावन
ISBN 978-9360863333
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