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राग दरबारी हिंदी साहित्य का एक कालजयी व्यंग्यात्मक उपन्यास है, जिसमें स्वतंत्रता के बाद के भारतीय ग्रामीण समाज, राजनीति और प्रशासन की विसंगतियों का तीखा और यथार्थपूर्ण चित्रण किया गया है। श्रीलाल शुक्ल ने इस कृति में गाँव “शिवपालगंज” को केंद्र बनाकर शिक्षा व्यवस्था, पंचायत राजनीति, भ्रष्टाचार और सामाजिक विडंबनाओं पर गहरा व्यंग्य किया है। उपन्यास का कथानक अत्यंत रोचक और जीवंत है। इसके पात्र - वैद्यजी, रंगनाथ, बद्री पहलवान जैसे चरित्र भारतीय समाज की मानसिकता और व्यवस्था की सच्चाई को सामने लाते हैं। लेखक की भाषा में हास्य, व्यंग्य और कटाक्ष का अद्भुत संतुलन दिखाई देता है, जो पाठक को हँसाते हुए भी सोचने पर मजबूर करता है। “राग दरबारी” केवल एक गाँव की कहानी नहीं, बल्कि पूरे भारतीय समाज और व्यवस्था का दर्पण है। यह उपन्यास बताता है कि सत्ता, स्वार्थ और भ्रष्टाचार किस प्रकार सामाजिक मूल्यों को प्रभावित करते हैं। हिंदी साहित्य में यह कृति अपने प्रभावशाली व्यंग्य, जीवंत पात्रों और सामाजिक यथार्थ के कारण अत्यंत महत्वपूर्ण मानी जाती है।
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| Writer/Author | श्रीलाल शुक्ल |
| ISBN | 978-8126713967 |
| Edition | First |
| Publisher | Rajkamal Prakashan |
| Binding Type | Paperback |
| Language | Hindi |
| Weight | 300 g |
| Dimensions | 22 x 14 x 1 |
रागदरबारी कालजयी हिंदी उपन्यास है, जो उत्तर प्रदेश के एक काल्पनिक गांव शिवपालगंज की कहानी के माध्यम से भारतीय ग्रामीण जीवन, राजनीति और व्यवस्था के खोखलेपन पर करारा व्यंग्य करता है। क्लासिक व्यंग्यात्मक उपन्यास के रूप में इसे पढ़ा जा सकता है। नवपल्लव पर उपलब्ध है।
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