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Roohnama (रूहनामा) - Satish Kumar 'Roohdar'

Roohnama (रूहनामा) - Satish Kumar 'Roohdar'


         रूहनामा की कविताएँ इस शोर भरे समय में आदमी के भीतर बची हुई आख़िरी मनुष्यता की धीमी, लेकिन जिद्दी आवाज़ हैं। सतीश कुमार 'रूहदार' अपने शब्दों से कोई मंच नहीं सजाते, वे सीधे उस अँधेरे में उतरते हैं जहाँ स्त्रियाँ अब भी कैद हैं, लोकतंत्र अब भी भूखा है, प्रेम अब भी निर्वासित है और आदमी अपनी ही टूटनों के मलबे में खड़ा खुद को खोज रहा है। इन कविताओं में नारा नहीं है, मगर प्रतिरोध है। चीख़ नहीं है, मगर ऐसी चुप्पी है जो देर तक पीछा करती रहती है। कई कविताएँ पढ़ते हुए लगता है जैसे किसी ने हमारे समय की नस पर हाथ रख दिया हो। रूहनामा सिर्फ़ कविताओं का संग्रह नहीं, यह हमारे दौर की थकी हुई आत्मा का बयान है। यह किताब पढ़ी ही नहीं जाती बल्कि भीतर कहीं घटित होती है। नई हिंदी के इस नए कवि का स्वागत हर पाठक को करना चाहिए।

- प्रशांत सागर (कवि एवं किताबगंज के संस्थापक)

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