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दिन आखिरी

✍️ लेखन: सुधाकर | श्रेणी: नज़्म

 

अब नए पंछियों के कदम

 

जब पड़ेंगे इन्हीं शाख पर

अपनी फेंकी किताबें कभी

खेंच लेगी इन्हें बाह में

कुछ सड़ेंगे इन्हें चूम कर

कुछ उड़ेंगे नए ख्वाब में

हम जहां बैठकर हंस लिए

वो हसेंगे इन्हीं बात पर

 

क्लास अपनी कोई छोड़ कर

आयेगा दिल किसी आह पर

पीठ पर उंगलियों सी कलम

फिर गढ़ेगी कहानी कोई

ले टिफिन में चली आयेगी

रोज खाना कोई बांध कर

 

आज कॉलेज का दिन आखिरी

हर समय आखिरी है सखी

रुक रहा है यहां कौन अब

बात जो भी थी वो जा चुकी

अब चिढ़ाता किसे कौन है

अब किसे रूठना है यहां

अब तो हंस दो मुझे देख कर

फूल मारो किसी बात पर

 

है नयी डिग्रियां साथ पर

डिग्रियों का कोई काम है

अब नए रास्ते पर कदम

दोस्तों के नहीं हाथ पर

बस यहीं ज़िंदगी है सखी

हर खड़ी की घड़ी है सखी

यूं न प्रोफेसर के कभी

चल सकेंगे वहां रूल अब

हम गुजर जाएंगे बाग से

किसको देखेंगे ये फूल अब

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