कृपया प्रतीक्षा करें...
✍️ लेखन: संदीप द्विवेदी
सच लिखना लेखकों,
लेकिन खिला देना फूल
रेत की मिट्टी में
बो देना उम्मीद
अपनी अंतिम पंक्ति में
कुछ भी करना लेकिन,
हौसलों को हारने मत देना।
लिखना कि पेड़ सूख गए हैं
छाँव नहीं है...पतझड़ है
लेकिन कभी
उसे गिरने मत देना
लिखना कि
पत्तियाँ हरी होंगी
आँधियाँ कुछ नहीं
इनकी जड़ों के आगे
अपनी डालियों में
समेट सकती हैं
ये समूचा तूफ़ान।
सच लिखना लेकिन
कुछ इस तरह।
दौर की आई
निराशा लिखना,
तबाही लिखना
पर लिखना उस पर भी
जो खड़ा रहा
बरबाद होकर भी
पाँव लहूलुहान रहे
लेकिन रास्ते भर
उसके चलते हुए
पैरों के निशान मिले।
सच लिखना लेकिन
कुछ इस तरह।
लिखना सच
कि सन्नाटा है चारों ओर
चीख़ें हैं चारों ओर
हिम्मत है टूटी हुई
मन डरा हुआ है।
लेकिन लेख यहाँ मत रोकना
लिखना कि पंछी
अब भी फड़फड़ाते हैं
उनकी चहचहाहट
अब भी उमंग घोलती है
हिम्मत टूटी हुई है
लेकिन हारी नहीं है।
साँसें अब भी
दम भर रही हैं
उड़ने के लिए
सच लिखना लेकिन
कुछ इस तरह
लिखना सच
क्योंकि एक तुम्हीं हो
जो बिखेर सकता है
निराशा में आशा
आँसुओं को बना सकता है
पौधों का पानी
ढूँढ़ सकता है संभावनाएँ
आपदाओं में भी
एक तुम्हीं हो
एक तुम्हीं बचे हो
तुम मत भूलना
अपनी ज़िम्मेदारी
क्योंकि दुनिया डटी है
वो देख रही है राह
तुम्हारे लेख का
तुम्हीं बंधा सकते हो उसे ढाँढस
तुम्हीं दे सकते हो उसे साहस
तुम्हीं दे सकते हो उसे
निडरता का वरदान।
सच लिखना लेकिन
कुछ इस तरह।
स्रोत : नवपल्लव के लिए कवि संदीप द्विवेदी द्वारा चयनित कविताओं में से एक कविता ‘यदि राम सा संघर्ष हो...’
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