कृपया प्रतीक्षा करें...
✍️ लेखन: संदीप द्विवेदी
मिलना था जो नहीं मिला वो
चलना था जो नहीं चला वो
माना सपने चूर हो गए
तुम मिटने को मज़बूर हो गए
लेकिन इस हार को जीवन भर
ढोने से कुछ होता है क्या?
नहीं हुआ तो हो जाएगा,
रोने से कुछ होता है क्या?
नाम एक गिनवाओ मुझको
आसानी से मिला हो जिसको
जीत का अपना ढंग रहा है
पथ, मुश्किल के संग रहा है
अब है मुश्किल तो है मुश्किल
यूँ डरने से कुछ होता है क्या?
नहीं हुआ तो हो जाएगा,
रोने से कुछ होता है क्या?
दुनिया तुमको क्या बोलेगी?
जो बोलेगी वो बोलेगी
तुमको तो राह पता है न
हार-जीत हर पल है न
तुम जो हो तुमको मालूम है
कहने से कुछ होता है क्या?
नहीं हुआ तो हो जाएगा,
रोने से कुछ होता है क्या?
रही उजड़ती फसलें फिर भी
खेत कभी ना बंजर छोड़े
उस किसान ने हार न मानी
उसने कभी न घुटने मोड़े
हालात पे रोकर जीते जी
मरने से कुछ होता है क्या
नहीं हुआ तो हो जाएगा,
रोने से कुछ होता है क्या?
स्रोत : नवपल्लव के लिए कवि संदीप द्विवेदी द्वारा चयनित कविताओं में से एक कविता 'यदि राम सा संघर्ष हो...'
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