कृपया प्रतीक्षा करें...
✍️ लेखन: संदीप द्विवेदी
जब कोई गिरकर
दोबारा उठता है न...
बहुत मज़बूत होता है...
बहुत।
ये जो हारने से
आँसू बह रहे हैं न
ये बहते हुए आँसू
ये कहते हुए बहते हैं कि
ये जब थमेंगे
ये दोबारा नहीं आएँगे
क्योंकि ये पैदा करेंगे हिम्मत
ये भरेंगे हौंसला
आगे बढ़ने का, लड़ने का
उठने का, जूझने का
क्योंकि ये आँसू जानते हैं...
जब कोई दोबारा उठता है न
बहुत मज़बूत होता है...
बहुत।
मैं जिस दौड़ में अव्वल रहा
मेरे पैरों से ख़ून नहीं बहे
मेरे पैर नहीं थके
क्योंकि ये थक चुके हैं
बह चुके हैं
उन सभी दौड़ों में
जिनमें मैं हारता रहा
अब नहीं उकेर पाएँगी इन्हें
धरती की खुरदुरी परतें
बल्कि अब धरती को
सहेजने होंगे
मेरे पैरों के चिह्न
क्योंकि ये जानती हैं
जब कोई दोबारा उठता है न
बहुत मज़बूत होता है...
बहुत...
जिन धक्कों ने तुम्हें
पीछे धकेला है
उसे महसूस करना
महसूस करना
भागती हुई दुनिया में
खड़े हुए तुम
तुम देख पाओगे
ख़ुद को तैयार होते
तुम्हारी नसों में
ज्वार बनते
अब नहीं रोक पाएगी
तुम्हें भीड़ की चट्टान
क्योंकि यही सच है...
जब कोई गिरकर दोबारा उठता है न
बहुत मज़बूत होता है...
बहुत।
स्रोत : नवपल्लव के लिए कवि संदीप द्विवेदी द्वारा चयनित कविताओं में से एक कविता ‘यदि राम सा संघर्ष हो...’
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