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घाट की तन्हाई

✍️ लेखन: शिवम त्रिपाठी

 

घाट पे बैठा उदास, कुछ परेशान सा था
उम्मीद की किरण देख, थोड़ा हैरान सा था
सोचता, लिखता, फिर मिटा देता हर बात
यादों की परछाई में खोता हर रात

नया दिन, नई सुबह खोजने चला
पर शाम ढले फिर वही दर्द पला
हर लम्हा उसकी यादों में सिमट जाता हूँ
खुद को फिर से वही अधूरा सा पाता हूँ

पलकों में छुपे हैं ख्वाब, जो अधूरे रहे
उसकी हर मुस्कान के किस्से कब के कहे

चाँदनी भी अब अँधेरों सी लगती है
जिंदगी बिन उसके अधूरी सी लगती है

लहरें भी मेरे दर्द को छूकर लौट जाती हैं
हर सांस में उसकी खुशबू छोड़ जाती हैं
इंतजार है उस पल का, जब वो पास होगी
मेरी हर अधूरी दुआ तब खास होगी

बस इसी उम्मीद में हर दिन गुजारता हूँ
घाट पर बैठा, अपने ख्यालों में हारता हूँ
शायद किसी दिन वो लौट आएगी
मेरी तन्हाई में रोशनी फैलाएगी।

 

 

स्रोत : नवपल्लव के लिए शिवम त्रिपाठी द्वारा चयनित कविता। 


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