कृपया प्रतीक्षा करें...
✍️ लेखन: शिवम त्रिपाठी
नहीं लगता अब मौत से भय
हर रोज़ मरता हूँ मैं
जितना संघर्षशील पिता ने बनाया
उतना ही संघर्ष हर रोज़ करता हूँ मैं
कभी भूखा, कभी प्यासा
कभी धूप में, तो कभी बारिश में भटकता हूँ मैं
नहीं लगता अब मौत से भय
हर रोज़ मरता हूँ मैं
झूठ कहते हैं लोग कि लड़के प्रेम में मर जाते हैं
अरे, समाज का पर्दा हटाकर देखो
बेचारे तो इल्ज़ाम में मर जाते हैं
मौत को बदनाम करके
ज़िंदगी ही हमें हर रोज़ तड़पाती है
ये जो काली रात होती है न दोस्तों
हर रोज़ हमें रुलाकर सुलाती है
अब नहीं लगता मौत से भय
क्योंकि हर रोज़ मरता हूँ मैं।
स्रोत : नवपल्लव के लिए शिवम त्रिपाठी द्वारा चयनित कविताओं में से एक कविता।
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