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इश्क़ और इंक़लाब

✍️ लेखन: सतीश कुमार 'रूहदार'

इश्क़  से  डरता  है
जातिवादी  समाज
इश्क़  से  भड़कते  हैं
रूढ़िवादी  लोग
थरथराता  है  पुरुषवादी  संसार,
काँपती  है  सामंतवादी
- पूँजीवादी  सोच

इश्क़  से  डरती  है
शोषण  की  हर  व्यवस्था,
क्योंकि  इश्क़  है  तो
रूहानियत  है  और
रूहानियत  है  तो  तुम  हो,  मैं  हूँ,
है  समता  और  बराबरी

उनके  इंक़लाब  और
मेरे  इंक़लाब  में
फ़र्क़  सिर्फ  इतना  है 
मैं  इश्क़  को  ही
इंक़लाब  समझता  हूँ

मैं  इंक़लाब  लिखना  भी  चाहूँ,
तो  इश्क़  लिखा  जाता  है

 

रूहनामा/कोहबर प्रकाशन/लखनऊ/2026/पृष्ठ-15


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