कृपया प्रतीक्षा करें...
✍️ लेखन: सतीश कुमार 'रूहदार'
मुहाफ़िज़ों की महफ़िल में
रिवाज़ों की गलियाँ भी तंग है
औरत तब भी बंद थी
और आज भी वो बंद है
चहारदीवारी में सिमटी ज़िंदगी
अब भी हैं कई
कुछ घर की दहलीज़
तो कुछ परदों में नज़रबंद हैं
आज़ादी के मायने
तब भी वही थे
और आज भी वही है
पर किसके लिए ?
लोग कहते हैं ‘लॉकडाउन’ है
वो पूछती हैं कब से ?
रूहनामा/कोहबर प्रकाशन/लखनऊ/2026/पृष्ठ-21
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