कृपया प्रतीक्षा करें...
✍️ लेखन: सतीश कुमार 'रूहदार'
ये टिड्डियाँ भी
बड़ी ख़तरनाक होती हैं
सूखे झाड़ - झंखाड़ों
को छोड़ कर
खेतों की हरी ख़रीफ़ - रबी
सब चबा जाती हैं
होती तो कीट पतंगों सी
पर दलों में बढ़ती हैं
मेहनतकश किसानों की
शामत हैं ये टिड्डियाँ
ये टिड्डियाँ तो अभी आयी हैं
उड़ जाएँगी फिर एक दिन
यहाँ तो सालों से
आबाद भी हैं कुछ टिड्डियाँ
वो टिड्डियाँ बाज़ारू हैं
बाजार में बिकती हैं
अखबारों चैनेलों या
फिर संस्थानों में
इंसानों सी दिखती हैं
व्यापारी है धर्म की, सत्ता की
बेचती हैं इंसानियत
पूँजीवाद और बाजार की
पहरेदार भी हैं कुछ टिड्डियाँ
उन टिड्डियों की तरह
इन टिड्डियों के भी होते हैं दल
दल की सुनती हैं
दल ही के लिए
जीती मरती हैं
करती प्रचार - प्रसार
चबाती विचार भी हैं
ये कुछ टिड्डियाँ
कुछ टिड्डियाँ
हुक्मरानों सी होती हैं
सफ़ेद पोशों की जमात
लगती हैं कुछ टिड्डियाँ
कुछ बुनती हैं तिलिस्म सत्ता का
कुछ मायावी भी होती हैं
कुछ टिड्डियाँ विकास खा जाती हैं
कुछ चबाती हैं आधुनिक समाज
तो कुछ गणतंत्र
ये टिड्डियाँ भी
बड़ी ख़तरनाक होती हैं ।
रूहनामा/कोहबर प्रकाशन/लखनऊ/2026/पृष्ठ-16
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