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वह सज्दे में बैठा करती, हाथ उठे हुए, सर झुका हुआ, आँखें बंद। अपने लिए शायद ही कुछ माँगती और बाक़ी सबके लिए सब कुछ। उसने अपने आसपास की दीवारों से सवाल पूछे थे या नहीं पूछे थे, कोई नहीं जानता। पर वह वहाँ थी। एक नदी की तरह। कोई नहर नहीं। कोई ग्लेशियर नहीं। न खारा समंदर। नदी। सबकुछ साथ लेकर चलने वाली। किसी को नहीं छोड़ती। शहरों की ख़्वाहिशें पूरी करने को अपना काम मानती। उनको बसाती। उनसे बात करती। बारिश से पतझड़ तक। सर्दी से अगली गर्मियों तक। बिना माँगे। पर बिना झुके। शहरों को बिना नदी सोचा भी नहीं जा सकता। और इसलिए वह जीवन से भरी थी। और उसके आसपास सिर्फ़ जीवन था। जो जिया नहीं जाता, वह अंतरंग नहीं हो पाता। और फिर महसूस करना, किसी से ख़ुद को जोड़ना इतना सरल नहीं है, कई बार नैसर्गिक भी नहीं होता। मैं नदी होना चाहता हूँ, मेरे हिस्से दीयर आया है। - इसी पुस्तक से
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| Writer/Author | Anchit |
| ISBN | 978-81-970454-8-6 |
| Edition | June 2026 |
| Publisher | Hindisthan Prakashan |
| Binding Type | Paperback |
| Language | Hindi |
| Weight | 200 g |
| Dimensions | 22 x 14 x 1 |
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