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इस उपन्यास की कहानी ठेठ देशी गांव की है। है। वही ठेठ भाषा, वही रीति-रिवाज, ठसक और सहज भोलापन। जहां जमीन जायदाद ही सब कुछ है, परंतु इस विरासत को संभालने के लिए औलाद भी जरूरी है। मगर जैसा जीवन लोग चाहते हैं अक्सर उन्हें वैसा नहीं मिलता। तब विश्वास टूटते हैं और प्रेम की दीवारें दरकने लगतीं हैं। स्वार्थ, जलन, ईर्ष्या, द्वेष और बिखराव परिवार जब टूटते हैं तो बहुत कुछ अनदेखा भी टूट जाता है और ये तब समझ में आता है जब आगन में धीरे-धीरे सूनापन उतर आता है और ये फैलते फैलते मन के कोनों से होते हुए खेतों तक पहुंच जाता है। अपने पराये हो जाते हैं और पराये अपने लगते हैं, मगर शांति नहीं मिलती। गांव की हरियाली, पंछियों की चहचहाहट, रंग-बिरंगे फूलों पर उड़ती तितलियां। मुंडेरों पर बोलतीं मोर सब फीके लगने लगते हैं। रिश्ते नाते तब भी निभाए जाते हैं, मगर उनमें स्वार्थ होता है या फिर समाज का डर। ऐसा ही बहुत कुछ अपने भीतर समेटे है "सूने सूने खेत"
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| Writer/Author | Hariram Kahaar |
| ISBN | 978-81-992793-1-5 |
| Edition | 2026 |
| Publisher | Vichar Prakashan |
| Binding Type | Paperback |
| Language | Hindi |
| Weight | 200 g |
| Dimensions | 22 x 14 x 1 |
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