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कुम्हार

✍️ लेखन: निहाल सिंह

खुदरे हुए हाथों से गुंदके 

माटी के वो बनाता है मटके 

तड़के कलेवा करने के बाद 

लगा रहता है वो दिन-रात 

स्वयं धूॅंप में नित- प्रतिदिन जलकर 

चाक को घुमाता है वो दिनभर 

 

ऑंखों की ज्योति धुॅंधली पड़ गई 

चश्में की नम्बर अधिक बढ़ गई 

अब के वैशाख के महीने में 

किए है सत्तर साल जीने में 

उसने माटी का रंग बदलकर 

चाक को घुमाता है वो दिनभर 

 

माथे के बाल सफ़ेद हो गए 

दाढ़ी के बाल समस्त सो गए 

चमड़ी पर इंक सी गिरने लगी 

भाल पर झुर्रियां पसरने लगी 

मेह में बूड्ढे तन को भिगोकर 

चाक को घुमाता है वो दिनभर।

 

 

स्रोत : नवपल्लव के लिए निहाल सिंह द्वारा चयनित कविताओं में से एक कविता। 


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