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साॅंझ ढ़ली

✍️ लेखन: निहाल सिंह

महीधर पर छाई घटाऍं 

नाचने लगे पपीहा मोर 

चारों दिशा में बिखरा तिमिर 

उठने लगा पादप से शोर 

टिप-टिप से प्रारंभ बूंदों की

होने लगी पावस घनघोर 

साँझ ढ़ली फिर चले पखेरू 

अपनी-अपनी नीड़ की ओर 

 

रैन सारी रूके न नीरद 

नीड़ के आंतरिक नया नीर 

नन्हें शिशु लगे थरथराने 

भय से कलेजा हुआ अधीर 

शील ने बदला रूप विचित्र 

जिस पर चले न किसी का जोर 

साँझ ढ़ली फिर चले पखेरू 

अपनी-अपनी नीड़ की ओर 

 

घुले पय में तिनके अनगिनत 

 देखी नयन ने ऐसी मिस्ल 

स्खलित हुए नयनजल धारा 

लगे सुलगने शम्बरं के तल 

मूँद के पाँख में अपत्य को 

खेचर निकल गए कही ओर 

साँझ ढ़ली फिर चले पखेरू 

अपनी-अपनी नीड़ की ओर।

 

 

स्रोत : नवपल्लव के लिए निहाल सिंह द्वारा चयनित कविताओं में से एक कविता।  


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