कृपया प्रतीक्षा करें...
✍️ लेखन: निहाल सिंह
निर्धन की बकरी नित्य-
दिन जाऍं वन की ओर
रूखा सूखा जो मिल जाऍं
खाकर करें न शोर
उसके अधिपति का कोई
भी अपना भूम नही
चित चाहें जहाॅं लग
जाती है वो चरने वही
शीत प्रभा को नन्हें -नन्हे
अपने शिशु के साथ
चलते फिरते वन में करें
पथ से मन की बात
देख उसे बांगबान
की ऑंखें चढ़ने लगी
किंतु वो निरंतर आगे
की ओर बढ़ ने लगी
वो चरकर के शिशु के
माथे को दुलारती है
वापस अपने बाड़े की
ओर चली जाती है।
स्रोत : नवपल्लव के लिए निहाल सिंह द्वारा चयनित कविताओं में से एक कविता।
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