कृपया प्रतीक्षा करें...
✍️ लेखन: प्रशांत अरहत
तेरी शर्तों पे तुझे प्यार नहीं कर सकता
ये भी सच है कि मैं इंकार नहीं कर सकता
मेरी फ़ितरत है कि हर शख़्स को हँसता देखूँ
इसलिए मैं तुझे बेज़ार नहीं कर सकता
मैं तुझे प्यार बहुत करता हूँ सच है लेकिन
हाँ, सरेआम तो मैं इज़हार नहीं कर सकता
बात करता हूँ तो फ़िर चैट मिटा देता हूँ
आप जैसा उसे अख़बार नहीं कर सकता
सौ अगर सुख हैं तो इक दुःख का क्या रोना धोना
ज़िंदगी अपनी ही दुश्वार नहीं कर सकता
प्यार वो काम नहीं जिसको ये कह के टालें
एक ही काम लगातार नहीं कर सकता
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