कृपया प्रतीक्षा करें...
✍️ लेखन: प्रशांत अरहत
सितम हद से ज़ियादा हो रहे हैं
ये रिश्ता बोझ जैसा ढो रहे हैं
जिन्हें अपना समझ बैठे थे हम तो
वही चेहरे मुखौटे हो रहे हैं
ज़मीं पर ख़ून है जो दरअसल ये
सियासी हाथ अपने धो रहे हैं
मेरे ख्वाबों में आना छोड़ दो तुम
मेरे अब ख़्वाब पूरे हो रहे हैं
जो रहबर थे वही तो दरअसल अब
मेरी राहों में काँटे बो रहे हैं
स्त्रोत - नवपल्लव बुक्स के लिए लेखक द्वारा भेजी गई रचना
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