कृपया प्रतीक्षा करें...

YOUR CART
Total: ₹0
मेन्यू

सितम हद से ज़ियादा हो रहे हैं

✍️ लेखन: प्रशांत अरहत

सितम हद से ज़ियादा हो रहे हैं 

ये रिश्ता बोझ जैसा ढो रहे हैं

 

जिन्हें अपना समझ बैठे थे हम तो

वही चेहरे मुखौटे हो रहे हैं

 

ज़मीं पर ख़ून है जो दरअसल ये

सियासी हाथ अपने धो रहे हैं 

 

मेरे ख्वाबों में आना छोड़ दो तुम 

मेरे अब ख़्वाब पूरे हो रहे हैं

 

जो रहबर थे वही तो दरअसल अब

मेरी राहों में काँटे बो रहे हैं

 

स्त्रोत - नवपल्लव बुक्स के लिए लेखक द्वारा भेजी गई रचना


और ग़ज़ल

जो मुझको हो रहा है उसका चौथाई ही लिक्खा है
पढ़ें
कभी तो आँखों में तेरी भी इंतिज़ार दिखे
पढ़ें
कहीं दूर घर हैं, कहीं नौकरी है
पढ़ें
बुरे दिन में जो बदले थे, वो रिश्ते याद रखता हूँ
पढ़ें
ज़माना हो न हो लेकिन तुम्हारा साथ काफ़ी है
पढ़ें
तेरी शर्तों पे तुझे प्यार नहीं कर सकता
पढ़ें

Start typing and press Enter to search