कृपया प्रतीक्षा करें...

YOUR CART
Total: ₹0
मेन्यू

कहीं दूर घर हैं, कहीं नौकरी है

✍️ लेखन: प्रशांत अरहत

कहीं दूर घर हैं, कहीं नौकरी है

कहीं रूह मेरी, कहीं ज़िंदगी है

 

तेरी आस में ही तो ज़िंदा हैं वरना

ये आहिस्तगी से मेरी खुदकुशी है

 

कई है मुखौटे यहाँ पर सभी के 

यहाँ पर कोई क्या असल आदमी है

 

मुहब्बत कि अब क़द्र है ही नहीं कुछ

धुरी पे ही पैसों की दुनिया टिकी है

 

कहीं भी कभी भी तेरा नाम आया

कहा मेरे दिल ने मुहब्बत मेरी है

 

अभी नींद आएगी हमको न 'अरहत'

मुहब्बत नई है ये चाहत नई है


और ग़ज़ल

जो मुझको हो रहा है उसका चौथाई ही लिक्खा है
पढ़ें
कभी तो आँखों में तेरी भी इंतिज़ार दिखे
पढ़ें
बुरे दिन में जो बदले थे, वो रिश्ते याद रखता हूँ
पढ़ें
ज़माना हो न हो लेकिन तुम्हारा साथ काफ़ी है
पढ़ें
सितम हद से ज़ियादा हो रहे हैं
पढ़ें
तेरी शर्तों पे तुझे प्यार नहीं कर सकता
पढ़ें

Start typing and press Enter to search