कृपया प्रतीक्षा करें...
✍️ लेखन: प्रशांत अरहत
कहीं दूर घर हैं, कहीं नौकरी है
कहीं रूह मेरी, कहीं ज़िंदगी है
तेरी आस में ही तो ज़िंदा हैं वरना
ये आहिस्तगी से मेरी खुदकुशी है
कई है मुखौटे यहाँ पर सभी के
यहाँ पर कोई क्या असल आदमी है
मुहब्बत कि अब क़द्र है ही नहीं कुछ
धुरी पे ही पैसों की दुनिया टिकी है
कहीं भी कभी भी तेरा नाम आया
कहा मेरे दिल ने मुहब्बत मेरी है
अभी नींद आएगी हमको न 'अरहत'
मुहब्बत नई है ये चाहत नई है
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