कृपया प्रतीक्षा करें...
✍️ लेखन: प्रशांत अरहत
कभी तो आँखों में तेरी भी इंतिज़ार दिखे
कभी तो मेरी तरह तू भी बेक़रार दिखे
कभी तो दर्द मेरा तुझको भी रुला जाए
कभी तो आँख तेरी मुझको अश्क-बार दिखे
कभी तो नींद में आ कर गले मिलो हमसे
कभी तो ख़्वाब ये हम को भी बार–बार दिखे
कभी तो वक़्त की गर्दिश से छूट के इंसाँ
कभी तो भूखे की चौखट पे रोजगार दिखे
कभी तो ज़ुल्म पे ये सारा शहर जाग उठे
कभी तो मुल्क़ का रहबर भी शर्मसार दिखे
कभी तो अपनी सियासत का आईना देखो
कभी तो तुमको ये दामन भी दाग़दार दिखे
कभी तो छोड़ के दुनिया के सब झमेलों को
कभी तो ढूँढता मुझको तू एक बार दिखे
कभी तो टूटे तिलिस्म-ए-जहाँ भी ऐ 'अरहत'
कभी तो सामने सच का वो शाहकार दिखे
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