कृपया प्रतीक्षा करें...
✍️ लेखन: प्रशांत अरहत
बुरे दिन में जो बदले थे, वो रिश्ते याद रखता हूँ
मैं उनसे हँस के मिलता हूँ, वो चेहरे याद रखता हूँ
कहाँ, कब, कौन सी, किसने, कही अच्छी–बुरी बातें
मैं बातें भूल जाता हूँ, वो लहजे याद रखता हूँ
दिया है साथ कब, किसने कहाँ मुझको ज़रूरत पर
मैं कैसे भूल सकता हूँ सहारे याद रखता हूँ
मेरी ग़ुर्बत ने मारा है तमाचा गाल पर जब से
कि पैसा ही तो सब कुछ है, मैं तब से याद रखता हूँ
Start typing and press Enter to search