कृपया प्रतीक्षा करें...

YOUR CART
Total: ₹0
मेन्यू

बुरे दिन में जो बदले थे, वो रिश्ते याद रखता हूँ

बुरे दिन में जो बदले थे, वो रिश्ते याद रखता हूँ

✍️ लेखन: प्रशांत अरहत

बुरे दिन में जो बदले थे, वो रिश्ते याद रखता हूँ 

मैं उनसे हँस के मिलता हूँ, वो चेहरे याद रखता हूँ 

 

कहाँ, कब, कौन सी, किसने, कही अच्छी–बुरी बातें 

मैं बातें भूल जाता हूँ, वो लहजे याद रखता हूँ 

 

दिया है साथ कब, किसने कहाँ मुझको ज़रूरत पर

मैं कैसे भूल सकता हूँ सहारे याद रखता हूँ 

 

मेरी ग़ुर्बत ने मारा है तमाचा गाल पर जब से

कि पैसा ही तो सब कुछ है, मैं तब से याद रखता हूँ


और ग़ज़ल

जो मुझको हो रहा है उसका चौथाई ही लिक्खा है
पढ़ें
कभी तो आँखों में तेरी भी इंतिज़ार दिखे
पढ़ें
कहीं दूर घर हैं, कहीं नौकरी है
पढ़ें
ज़माना हो न हो लेकिन तुम्हारा साथ काफ़ी है
पढ़ें
सितम हद से ज़ियादा हो रहे हैं
पढ़ें
तेरी शर्तों पे तुझे प्यार नहीं कर सकता
पढ़ें

Start typing and press Enter to search