कृपया प्रतीक्षा करें...
✍️ लेखन: सुधाकर
"मैं मूर्तियों में नहीं किताबों में हूँ,
मुझे पूजने की नहीं पढ़ने की जरूरत है"
अगर ये आप बोले हैं तो ठीक ही होगा
पर बाबा आप मूर्तियों में भी हो।
मैं सच कहता हूँ मेरा यकीन मानो,
मैं आए दिन ये महसूस करता हूँ
और मैने देखा हैं कई टुन्नियों को
और बेअक्ल जाहिल भीड़ को
जो जानती है
आप की लेखनी
लंबी नदियाँ हैं
जो अनंत हैं
वो जानती हैं
भीम की मूर्तियाँ
'पर्वत' हैं।
इतना ऊँचा पर्वत
जिसने मनुवादियों को रोक दिया है
उनकी हालत पस्त कर दी है
उनके षड्यंत्र व्यर्थ जा रहें हैं
अब वो कुछ भी कर लें
पर पर्वत के इस पर वो नहीं आ सकते
तो फिर वो तोड़ते है
बाबा साहेब आप मूर्तियों में भी हो
कुछ लोग आपकी मूर्तियां ही तोड़ते हैं।
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