कृपया प्रतीक्षा करें...

YOUR CART
Total: ₹0
मेन्यू

बाबू किशोर

✍️ लेखन: सुधाकर

पिंजरे बनाओं

फ़साओं तीतर

 

सताओ सागर

रंगीन मछली

लगाओ छर्रे

गिराओ हाथी

मारो हिरण

बनाओं गिलोल

बिठाओ मोर

बनाओं नरम रस्ते

उड़ाओ गाड़ी

रोको नदिया

मुट्ठी से बांधो

धरती दुनिया

दिखाओ नए,

प्रगतिशील इशारें

नक्शे दिखाओ

खोल किताबें

पैर फिलाओ

चारों ओर

धूल उड़ाओ

चारों ओर

रोज सोचो ख्वाब नए

आग लगाओ

 

चारों ओर

लेकिन सुनो, अजी सुनो

विकासवादी बाबू किशोर

धरती से दंगल जीतोगे !

काट के जंगल जीतोगे !

तो तोड़ो पर्वत

बनाओं मरघट

उठाओ कुल्हाड़ी

काटो काटो

सब काटो

लो काटो शीशम

लो काटो पीपल

काटो मेरे दोनों हाथ

काटो बूढ़े

बड़े बरगद

लो काटो बाबू किशोर

अपना ही सर


और कविताएँ

एकलव्य अभी मरा नहीं है
पढ़ें
बाबासाहेब की मूर्तियाँ
पढ़ें
फूलन
पढ़ें

Start typing and press Enter to search