कृपया प्रतीक्षा करें...
✍️ लेखन: सुधाकर
ओए चमार,
अबे सुन भंगी,
कहके गंदी
गाली देते हो
चोर का संघी हमे
हमारी माँओं को,
रण्डी कहते हो।
हमें अछूत समझो
हमें गंवार ज़रुर समझो
पर हो रही है,
तुमसे कहीं कोई भूल,
समझो।
ये पीढ़ी
दुश्मनों को पहचानती है
लिखना जानती है
मैं लिख चुका हूँ
कई नाम,
जो पापी है कबूलेंगे
पेड़ों पर कटे सर झूलेंगे
तुम्हें मालूम पड़ेगा एक दिन
हम मरघट पर क्यों रहे हैं
तुम सोचते हो
मैं डर गया हूँ,
सहम गया हूँ,
मैं चुप हूँ,
और मैं सोचता हूँ
तलवारें कैसे चलती हैं?
बम कैसे बनते हैं?
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