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एकलव्य अभी मरा नहीं है

✍️ लेखन: सुधाकर

हम जानते हैं 

और ये हम ही जानते हैं 

तुम्हारी नींद उड़ रही हैं 

क्योंकि तुम्हारी मान्यताएँ टूट रही है

तुम्हारे ईश्वर पर थूका जा रहा है 

 

हमको मालूम है,

धर्म तुम्हारा खतरे में है!

क्योंकि 

जिनको तुम अछूत समझते थे 

वो आज स्कूलों में हैं 

हम पढ़ रहे हैं 

तुम्हारे छलियों की करतूत 

तुम्हारे मनगढ़ंत ग्रंथ

तुम्हारे झूठ,

 

बच्चे बाबा साहेब,

बाबासाहेब रट रहे हैं

तुम्हारी लुंगी ढीली हो रही है

धूर्तों तुम्हारे चेहरों के रंग हट रहे हैं

तुम जातिवादी कैंसर के मरीज हो 

तुम्हें खा रही हैं बीमारी 

तुम चिड़ते हो

तुम जलते हो 

होती तरक्की से हमारी,

 

अब मुसहर जूठन नहीं खाते 

भागियों ने झाड़ू फेंक कलम पकड़ ली है 

जब तुम्हारे ग्रंथो के मुताबिक़

नहीं हो पा रहा है कुछ 

तो तुम विचलित हो 

तुम सोचते हो

तो घबराते हो 

महार मौत से नहीं डरते 

चांडाल अब मरी लाशे नहीं 

दुश्मन फूँक रहे हैं

ये सब देख के

तुम्हारे पसीने छूट रहे हैं

तुम्हारे रीढ़ से दर्द उठ रहा है,

 

हम जानते है,

और ये हम ही जानते है

अभी तुम्हारी साँसे भी फुलेंगी

क्योंकि तुम जानते हो,

और बस तुम ही जानते हो

चमार अब केवल जूते बनाते नहीं 

खिलाते भी हैं,

 

वो पुराने दिन गए 

जब तुम्हारा षड्यंत्र चलता था 

जब तुम्हारी चालाकी चलती थी 

भोली माओं के बच्चे तुम मार देते थे 

और माँए हाथ मलती थी

अब तुम्हारा द्रोणाचार्य आए

तो उसकी अक्ल के लिए 

उसको ये बतलाना 

धनुष बाण हमने छोड़ा नहीं है 

और याद रहे!

एकलव्य हमारा,

अभी मरा नहीं है।

 


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