कृपया प्रतीक्षा करें...
✍️ लेखन: सुधाकर
अपनी मुट्ठी बांधों अब
अपने हक़ में बोलो अब
समझो हवा की बातों को
तलवारों की धारों को
लोगों से क्यों डरती हो
तुम वो करो जो मर्ज़ी हो
अपना गीत बनाओ कुछ
इक आवाज उठाओ तो
पास बुला लो पहलूं में
इस आकाश के जादू को
अंतरमन की झाकों लौ
धर्म तमाशा छोड़ ही दो
हाथ क़लम और क़ागज़ लो
तुम बंदूक सी ताकत हो
चंदा की तुम सैर करो
और विरोधी ढेर करो
ठीक नहीं है, कहना यूं
लड़की, तुम तो कोमल हो
विरसा याद करो अपना
फूल नहीं, तुम फूलन हो
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