अंगिका क्षेत्र की ऐतिहासिकता और लोकसाहित्य

 

लेख सार :

                भारत जो कि विविधताओं का एक समुच्चय रहा है, जिसमें सांस्कृतिक, भाषिक, धार्मिक विविधता होने के बावजूद भी आपस में बैर भाव नहीं दिखाई पड़ती है। प्राचीन भारतीय इतिहास में बिहार का स्थान बड़ा ही महत्वपूर्ण रहा है, चाहे वह कोई भी क्षेत्र हो। यही वह धरती है जिसने दुनिया को पहले पहल मध्यम मार्ग या यूं कहें कि अहिंसा का पाठ पढ़ाया। जब हम भारत का प्राचीन इतिहास देखते हैं, तो बिहार अन्य किसी भी राज्य के मुकाबले सर्वोच्च पायदान पर स्थित दिखेगा। जब हम महाजनपदों के युग में आते हैं, तो बिहार से अकेले तीन-चार महाजनपद आपको दिखेगा। उन महाजनपदों में एक समृद्ध और वैभवशाली महाजनपद ‘अंग देश’ का भी नाम है। यह वही ‘अंग’ है जिसका जिक्र ‘महाभारत’ में ‘दानवीर कर्ण’ के नाम के साथ आता है। वेद, पुराण और ढ़ेर सारी प्राचीन पुस्तक में ‘अंग’ का उल्लेख मिलता हैअथर्ववेद में गंधार, मूजवान और मगध के साथ-साथ ‘अंग देश’ का उल्लेख भी हुआ है। बौद्ध धर्म के प्रमुख पुस्तक “ललित विस्तार” और नाथ पंथ के पुस्तक “शक्तिसंगमतंत्र” में भी ‘अंग’ का जिक्र मिलता है। जिससे इसकी प्राचीनता और ऐतिहासिक महत्व का पता चलता है।

बीज शब्द :-  अंगिका, अंग, महाजनपद, आनव वंश, कोसी नदी, मंदार पर्वत, अजगैवीनाथ पहाड़, बाबा विशुराउत

मूल लेख :-

                    अंग देश की स्थापना का उल्लेख हमें पुराण से ही मिलने लगता है। पुराण के अनुसार - राजा सागर के समकालीन राजा बलि की पत्नी सुदेष्णा को ऋषि दीर्घतमा के आशीर्वाद से ज्येष्ठ पुत्र अंग का जन्म हुआ और इन्हीं अंग ने पीछे अंग राज्य की स्थापन की। इसलिए उनके नाम पर ही इस क्षेत्र का नाम ‘अंग’ पड़ा। पात्र, परिवेश, स्थान और समय के परिवर्तन के साथ-साथ प्राय: परिभाषाओं में भी परिवर्तन हो जाया करती है, जिससे ऐतिहासिक मिथक भी लगभग-लगभग जन्म ले लेता है। इससे ही प्राचीन से प्राचीन वस्तु, स्थान, नाम, किसी महान वैयक्तित्व के साथ स्वतः किंवदंती जुड़ जाती है और अंग इससे अछूता न रह सका। चक्रवर्ती राजा ययाति के पुत्रों में एक ‘अनु’ हुआ,  जिससे ‘अनाव-वंश’ चला। इसी आनव वंश के एक प्रतापी राजा महामनस् (महामना) के पुत्र तितिक्षु ने विदेश एवं वैशाली के पूर्व स्थित प्रदेश (भागलपुर तथा मुंगेर) में आनव राज्य स्थापित किया था। प्रचुरता से प्राप्त साक्ष्यों के आधार पर आनव वंशीय राजा बलि पुत्र अंग के नाम पर ही यह राज्य बना।

                  भारतीय महाजनपदों के इतिहास में अंग देश का स्थान चौथा रहा है। इस राज्य द्वारा ही समूची पृथ्वी को विजयी किया गया था। अंगदेश की सीमा को लेकर ‘शक्तिसंगमतंत्र’ तंत्र में कहा गया है कि वैद्यनाथ से भुवनेश्वर तक अंग राज्य विस्तृत था। अंग की नगरी, विंटकपुर सागर तट पर थी। नदी सरयू भी कभी अंग देश में बहा करती थी। यह राज्य वर्तमान में उत्तर प्रदेश के पूर्वी भाग से वंगोपसागर तक फैला हुआ था। उत्तर में कोसी नदी और पूर्णिया के पश्चिमी भाग, मुंगेर एवं भागलपुर अंग में थे। गंगा के उत्तरी क्षेत्र को ‘अंगउत्तराप’ कहा जाता था। अंग-वंग भी कभी एक ही राज्य के अंतर्गत थे, कलिंग तो अंग में ही था। आधुनिक युग में भी बंगाल, उड़ीसा, बिहार का साथ लंबे समय तक रहा। बंगाल उड़ीसा झारखंड और बिहार के स्वतंत्र राज्य स्थापित होने के साथ ही अंग का एक बड़ा भौगोलिक क्षेत्र बिहार ही में स्थित है।

                कनिंघम महोदय ने बताया कि अंग देश और मगध देश की सीमा क्यूल नदी थी। आरंभिक इतिहास-काल में मगध से पूर्व एवं राजमहल पहाड़ियों से पश्चिम का क्षेत्र अंग जनपद था। जातकानुसार, राजगृह भी अंग का ही एक भाग था। मानभूमि, वीरभूमि, मुर्शिदाबाद तथा संथाल पारगना भी अंग महाजनपद में ही सम्मिलित थे। जिस राज्य का इतिहास इतना स्वर्णिम रहा है कि उसके बिना भारतीय प्राचीन इतिहास सुना सा दिखेगा, वह अपनी सांस्कृतिक, आर्थिक और राजनैतिक पहचान बनाने के लिए अपनों से वैचारिक युद्ध हेतु खड़े हैं। अंग महाजनपद ने भारत के अन्य जनपदों की तरह ही अपनी एक अलग लोक संस्कृति, लोक भाषा, लोक देवी-देवताओं को प्रतिष्ठित किया है। इसकी भाषा और लिपि का उल्लेख बौद्ध धर्म के प्रमुख पुस्तक ‘ललितविस्तार’ में है। ललितविस्तार में जिन चौसठ लिपियों का उल्लेख मिलता है उनमें ‘अंग लिपि’ का उल्लेख भी चौथे स्थान पर है। डेढ़ शताब्दी पूर्व तक अंगिका को ‘कैथी लिपि’ में लिखा जाता था; परंतु आजकल यह देवनागरी में लिखी-पढ़ी जाती है। इस क्षेत्र की बोली को ग्रियर्सन महोदय ने ‘छिका-छिकी’ कह कर संबोधित किया। बाद में राहुल सांकृत्यायन महोदय ने इस क्षेत्र की बोली को ‘अंगिका’ कह कर संबोधित किया। इसके बाद अंगिका ही सर्वमान्य हो गया।

               अंग महाजनपद, जिसका संबंध ‘रामायण’ तथा ‘महाभारत’ से जुड़ता है जिस हेतु इसकी सांस्कृतिक गरिमा उज्ज्वल और सर्वग्राही है। अंग जनपद में धार्मिक दृष्टि से दर्शनीय स्थलों में कुछ प्रमुख है- भागलपुर के सुल्तानगंज में गंगा के मध्य स्थित अजगैवीनाथ पहाड़, जिस पर जह्नमुनि का आश्रम है। जह्नमुनि ने राजा भगीरथ का अहंकार दूर करने के लिए गंगा को पी लिया था। बहुत अनुनय-विनय के पश्चात मुनि ने गंगा को अपने जांघ से प्रवाहित किया और यहीं से गंगा का नाम जाह्नवी’ पड़ा। एक अन्य प्रमुख धार्मिक स्थल में समुद्र मंथन में प्रयोग की गई मथनी ‘मंदार पर्वत’ (बाँका) आज भी कथित वासुकीनाग रूपी बनी रज्जु का चिह्न, पहाड़ी की चारों ओर देखा जा सकता है। यहीं भगवान विष्णु ने मधु दैत्य का संहार किया था। देवघर में स्थित द्वादश ज्योतिर्लिंग में प्रसिद्ध वैद्यनाथ महादेव का मंदिर है, जिसकी महिमा सर्वव्यापी है। सम्पूर्ण अंग देश में आज भी अनेक मंदिर और देवस्थान मौजूद है जहां सनातन धर्म सुरक्षित है। उनसे अनेक धार्मिक कथाएं और किंवदंतियाँ जुड़ी हुई है, जो धार्मिक विश्वासों को दृढ़ करती है।

               अंग जनपद केवल सनातन धर्म को ही नहीं; बल्कि बौद्ध और जैन धर्म के विकास को भी गति देने में पीछे नहीं रहा है। भगवान बुद्ध चम्पा में जाकर रहे हैं और बारहवें जैन तीर्थकार भी भागलपुर में ही निर्वाण प्राप्त करते हैं। मुस्लिम और ईसाई धर्म भी अंग देश में खूब फला-फूला है । अंग जनपद ने धार्मिक विकास में अपना बहुमूल्य योगदान दिया है। अंग जनपद में लोक गाथाओं की भरमार है। बिहार राष्ट्रभाषा परिषद् ने अपने विद्वतजन द्वारा अंग देश की लोक गाथाओं और संस्कार गीत का संग्रह करवाया है। इससे अंग क्षेत्र की गायब होती लोक धरोहर को पुस्तकाकार रूप तो मिला है पर लोक के मानस से वहाँ की संस्कृति संस्कार, भाषा, लोक कहानी, लोक गीत आदि का विलोपन भी खूब हुआ है। बिहार राष्ट्रभाषा परिषद् ने जो पुस्तक संपादित करवाया है, उसमे अंग में प्रचलित पैंतालीस लोकगाथा और चार गीत-रूपकों का उल्लेख मिलता है। अंग क्षेत्र के प्रसिद्ध लोक गाथाओं में- बहुला बिसहरी, महुआ घटवारिन, सलेस भगत, बाबा विशुराउत आदि बड़ी प्रसिद्ध लोक गाथा है।

                बाबा विशुराउत का मेला तो बिहार का राजकीय मेला भी बन गया है। यहां देश और नेपाल से भी लोग अपनी मनोकामना को पूर्ण होने और कुछ मांगने आते हैं। प्रति वर्ष यह मेला चौदह अप्रैल को मनाया जाता है। इस मेले की खास बात है कि यह मेला गाय, भैंस, बकरी की रक्षा हेतु ही प्रसिद्ध है। प्रत्येक सप्ताह के दो दिन यहां एक लघु मेले का आयोजन होता है, जिसमें सोमवार और शुक्रवार दिन ही निश्चित किया गया है। यहां पर गाय और भैंस के दूध के साथ गांजा बाबा पर चढाया जाता है, जिसमें दूध कच्चा ही रहना चाहिए। प्रसाद के रूप में यहां खीर और दही, चूड़ा परोसा जाता है। एक दूसरी गाथा महुआ घटवारिन का है जिसे आप फिल्मों में भी देख चुके हैं। इसका जिक्र फणीश्वर नाथ ‘रेणु’ की कहनी ‘तीसरी कसम उर्फ मारे गए गुलफाम’ में बड़ा मार्मिक चित्रण हुआ है, बड़ी प्रसिद्ध गाथा है। ‘बहुला विषहरि’ तो यहां के जनमानस के रग-रग में रसा-बसा है। ये दोनों नारी के व्यक्तित्व को मजबूत करने वाली ही लोक गाथा है।

                 अंगिका में पर्याप्त लोक गीत और संस्कार गीत भी मौजूद है। लोकगीत की प्राय: सभी मौलिक विशेषताएं संस्कार गीतों में मौजूद रहती है। लय की अव्याज मनोहरता और काव्य की अविचारिता-रमणीयता का मणि-कांचन-संयोग अन्य लोक लोकगीतों की तरह संस्कार-गीत में मिलता है। विवाह के एक संस्कार गीत में बाराती के आने पर सखियाँ गाती है-

“केकरा सोभे लाल लाल पगिया, केकरा सोभे मटुकिया

देखु देखु हे सखिया, दुलहा ऐलै बरियतिया ”

               बिहार के अंग क्षेत्र का सांस्कृतिक, धार्मिक, आर्थिक और राजनैतिक स्तर पर प्राचीन कालीन महत्व तो सभी को स्वीकार्य हैइस क्षेत्र के धरोहर को आज भी सुरक्षित रखने में यहां के जनमानस का बड़ा ही महत्वपूर्ण योगदान रहा है। फिर भी, जनमानस से यहां की प्राचीनता धीरे-धीरे ही सही मानस पटल से विस्मृत होती जा रही है। जिसका एक समृद्ध इतिहास रहा है, वह वहां की भाषा के ग़ायब होने के साथ-साथ अपनी अमूल्य धरोहर भूलती जा रही हैं।

सन्दर्भ ग्रंथ :--

1.      सं० पंडित वैद्यनाथ पांडेय और श्रीराधावल्लभ शर्मा, अंगिका-संस्कार-गीत, बिहार राष्ट्र भाषा परिषद्,  पटना, प्रथम संस्करण, 2000 ई॰

2.      डॉ॰ परमानन्द पांडेय, अंगिका का भाषा वैज्ञानिक अध्ययन, बिहार राष्ट्र भाषा परिषद्, पटना, प्रथम संस्करण 2016

3.      सम्पादक डॉ॰ शिवनारायण, जिज्ञासा संसार: अंगिका विशेषांक पत्रिका, नवंबर 2020

4.      विकिपीडिया

 

 

 

 घनश्याम कुमार

लेखक, शोधार्थी

केरल केन्द्रीय विश्वविद्यालय, कासरगोड़

ईमेल - ghanshyamtnb@gmail.com