किताबों की दुनिया में कुछ संग्रह ऐसे होते हैं जो केवल शायरी का संकलन नहीं होते, बल्कि मानवीय संवेदनाओं के दस्तावेज़ बन जाते हैं। आदरणीया अनिशा अंगिरा का ग़ज़ल-संग्रह “बेशक्ल राब्ता” इसी श्रेणी की एक उल्लेखनीय कृति है। यद्यपि यह मुख्यतः ग़ज़लों का संग्रह है, किन्तु इसमें सम्मिलित कुछ नज़्में भी इसकी भाव-भूमि को विस्तार प्रदान करती हैं। प्रेम, विरह, आत्मसम्मान, वफ़ादारी, रूहानी लगाव तथा मानवीय मनःस्थितियों के विविध आयाम इस संग्रह में अत्यंत संवेदनशीलता के साथ अभिव्यक्त हुए हैं। संग्रह का शीर्षक ही इसके मूल भाव-बोध की ओर संकेत करता है –
“है इक बेशक्ल सा ये राब्ता क्या
ख़ुदा जाने कि है ये माज़रा क्या”
दरअसल, यह संग्रह उन रिश्तों की पड़ताल करता है जिन्हें पारंपरिक सामाजिक परिभाषाओं में बाँध पाना संभव नहीं होता। ऐसे संबंध, जो मित्रता और प्रेम के बीच कहीं स्थित होते हैं, किंतु किसी निश्चित नाम या पहचान से परे रहते हैं। इसी भाव को शायरा एक अन्य शेर में अत्यंत प्रभावशाली ढंग से व्यक्त करती हैं–
“तुम मेरे क्या हो बताऊँ तो, समझ पाओगे
एक रूहानी सा एहसास हो या कुछ भी नहीं”
यही रूहानियत संग्रह को सामान्य प्रेम–काव्य से अलग पहचान प्रदान करती है। कई स्थानों पर यह स्पष्ट कर पाना कठिन हो जाता है कि संबोधन महबूब से है, किसी आत्मीय मित्र से, अथवा किसी ऐसे संबंध से जिसे केवल महसूस किया जा सकता है। यही अनिश्चितता इस संग्रह की सबसे बड़ी साहित्यिक शक्ति बनकर उभरती है। एक नज़्म में शायरा इसी भाव–द्वंद्व को स्वर देती हैं –
“न ये दोस्ती है न इश्क़ है
न ही जिस्म का है राब्ता
ए मेरे ख़ुदा! मुझे तू बता
मेरे उसके बीच में है ये क्या।”
संग्रह की चर्चित नज़्म “मन तो कहता है” भी इसी भावभूमि का विस्तार करती है। यहाँ प्रेम अधिकार की आकांक्षा नहीं, बल्कि समर्पण और संवेदना का रूप ग्रहण कर लेता है –
“सो तेरे ग़म का मुदावा तो नहीं हो सकती
पर ग़म–ए–दिल तेरा सीने से लगा सकती हूँ
तेरे जज़्बात की शिद्दत को है सजदा मेरा
तू बता इसके सिवा कर भी मैं क्या सकती हूँ।”
अनिशा अंगिरा प्रेम को केवल निजी अनुभूति के रूप में नहीं देखतीं, बल्कि उसे मनुष्य की स्वाभाविक प्रकृति मानती हैं। यही कारण है कि उनकी शायरी समय–समय पर सामाजिक प्रश्न भी उठाती है –
“मुहब्बत है इंसाँ की फ़ितरत तो क्यों फिर
ज़मानों से इसको दबाया गया है”
यह शेर प्रेम की वकालत भर नहीं करता, बल्कि उन सामाजिक संरचनाओं पर भी प्रश्नचिह्न लगाता है जिन्होंने सदियों से मानवीय भावनाओं को नियंत्रित करने का प्रयास किया है।
संग्रह का एक महत्वपूर्ण पक्ष यह भी है कि यहाँ प्रेम आत्मसमर्पण अवश्य है, किन्तु आत्मविस्मरण नहीं। शायरा अपने स्वाभिमान और नैतिक दृढ़ता को बराबर महत्व देती हैं–
“दिल अब कहने लगा है झूठ से दामन छुड़ा लूँ मैं
कि जितना बच गया है उतना तो ईमाँ बचा लूँ मैं”
और
“उठा सकती हूँ पत्थर हाथ में हर ईंट के बदले
मगर गिर जाए गर कोई तो क्या ख़ुद को गिरा लूँ मैं”
इन अशआर में एक ऐसा व्यक्तित्व दिखाई देता है जो प्रतिकार करने की क्षमता रखता है, परंतु अपनी मानवीयता और नैतिक मूल्यों से समझौता नहीं करता। प्रेम की कोमलता और रचनात्मकता भी संग्रह में अत्यंत सुंदर रूप में व्यक्त हुई है –
“अपने लब को बना के इक मिज़राब
जिस्म को मेरे तुम सितार करो”
यहाँ प्रेम मात्र आकर्षण नहीं, बल्कि संगीत की तरह एक सृजनात्मक अनुभूति बन जाता है। शब्दों का चयन और बिंबों की सघनता इस शेर को विशेष प्रभाव प्रदान करती है। विरह और उपेक्षा का दर्द भी इस संग्रह का एक प्रमुख स्वर है –
“उनके इनकार से बेज़ार हुए
हम बहुत बेबस ओ लाचार हुए”
और
“उनका बस एक तग़ाफ़ुल ठहरा
कितना अरमाँ यहाँ मिस्मार हुए”
इन पंक्तियों में प्रेम की विफलता का शोर नहीं, बल्कि एक गहरी और संयत उदासी है। महबूब का तग़ाफ़ुल केवल इच्छाओं को नहीं तोड़ता, बल्कि व्यक्ति के भीतर की संवेदनात्मक संरचना को भी प्रभावित करता है। संग्रह का एक अत्यंत प्रभावशाली पक्ष निष्काम प्रेम की अभिव्यक्ति है –
“मुझे दुख है कि तुम्हें मुझ से मिला कुछ भी नहीं
तुम्हें देने को दुआओं के सिवा कुछ भी नहीं”
और
“तुम फ़क़त ख़्वाब हो, क्या दोगे मुझे? हाँ लेकिन
दो घड़ी देख लूँ तो हर्ज है क्या?... कुछ भी नहीं”
यहाँ प्रेम किसी लेन-देन या प्रतिफल की अपेक्षा नहीं करता। वह प्रार्थना, स्मृति और शुभकामना के रूप में उपस्थित होता है। इसी भाव को शायरा एक अन्य शेर में और अधिक मार्मिकता के साथ व्यक्त करती हैं –
“हम नहीं आपके महबूब, ये माना हमने
हम मगर इसके सिवा आपके क्या कुछ भी नहीं?”
यह प्रश्न दरअसल पूरे संग्रह की आत्मा है। संबंध का स्वरूप अनिश्चित है, किंतु उसकी उपस्थिति निर्विवाद है। यही द्वंद्व “बे-शक्ल राब्ता” को विशिष्ट बनाता है। संग्रह में ऐसे रिश्तों की पीड़ा भी चित्रित हुई है जिन्हें सामाजिक स्वीकृति प्राप्त नहीं होती –
“तुम अयाँ आँख से हो जाओ न, डर जाते हैं
तुम को अपनों से छिपाते हैं जिधर जाते हैं”
इसके साथ ही शायरा मानवीय मनोविज्ञान की जटिलताओं को भी सूक्ष्मता से पकड़ती हैं –
“यूँ भी होता है कि कुछ लोग क़रीब आते हैं जब
हम को हमसे ही वो दूर बहुत कर जाते हैं”
यह शेर आधुनिक मनुष्य के भावनात्मक द्वंद्व और आत्मिक विस्थापन की गहरी अभिव्यक्ति है।
निष्कर्षतः – “बे-शक्ल राब्ता” केवल ग़ज़लों का संग्रह नहीं, बल्कि उन अनाम रिश्तों, अधूरे प्रेमों, रूहानी जुड़ावों और आत्मसम्मान से भरे जज़्बात का दस्तावेज़ है जिन्हें लगभग हर संवेदनशील व्यक्ति ने कभी न कभी अनुभव किया है। अनिशा अंगिरा की शायरी की सबसे बड़ी विशेषता उसकी भावनात्मक ईमानदारी, सहज अभिव्यक्ति और पाठक के हृदय तक सीधी पहुँच बनाने की क्षमता है।
यह संग्रह प्रेम को केवल इज़हार या प्राप्ति के रूप में नहीं, बल्कि एक गहरे मानवीय और रूहानी अनुभव के रूप में देखने की दृष्टि प्रदान करता है। इसे पढ़ते हुए बार-बार महसूस होता है कि कुछ रिश्तों की सबसे बड़ी ख़ूबसूरती यही होती है कि उन्हें किसी नाम की आवश्यकता नहीं होती; उनका एहसास ही उनकी पहचान होता है। “बेशक्ल राब्ता” ऐसे ही एहसासों की एक सशक्त और स्मरणीय काव्य-यात्रा है।
पुस्तक – बेशक्ल राब्ता(हार्ड कवर)
शायरा – अनिशा अंगिरा
समीक्षक – प्रशान्त ‘अरहत’
प्रकाशन– साहित्य कलश पब्लिकेशन
विधा – शायरी
पेज – 100
क़ीमत – 200/-
समीक्षक : संक्षिप्त परिचय – प्रशांत ‘अरहत’ युवा ग़ज़लकार हैं। शेर, ग़ज़ल, नज़्म कहते हैं, देश के विभिन्न मंचों पर सक्रिय हैं। स्थायी पता हरदोई, उत्तर प्रदेश लेकिन वर्तमान में लखनऊ रहते हैं।