अस्तित्व को तलाशती स्त्री की गाथा : हसीना मंजिल
महिला उपन्यासकारों में अपनी विशिष्ट स्थान रखने वाली डॉo उषाकिरण खान द्वारा रचित उपन्यास ‘हसीना मंजिल’ के केंद्र में अपनी अस्तित्व को तलाशती एक स्त्री की अद्वितीय कथा है। इस उपन्यास में स्त्री के साथ-साथ बंगाल विभाजन से उत्पन्न समस्या और अपनी मातृभूमि के प्रति प्रेम जैसे विषय को भी बराबर महत्व दिया गया है।
उपन्यास की कथा का शुरुआत सकीना के लाख की चूड़ीयाँ बनाने से होता है। इधर कुछ दिनों से प्रतिदिन सकीना के पास एक वृद्ध व्यक्ति आता है और उसे थोड़ी देर देखकर यथावत चला जाता है। पहले सकीना को वृद्ध व्यक्ति का व्यवहार कुछ अटपटा सा लगा किन्तु प्रतिदिन के आमना-सामना से दोनों एक-दूसरे से परिचित हो जाते हैं। एक दिन वृद्ध व्यक्ति ने सकीना से पूछा कि वो अकेली क्यों रहती है, बच्चों का पिता कहाँ है? इस पर सकीना जवाब देती है कि “बाबा मेरे बच्चों के पिता परदेस कमाई करने गये हैं।”(पृ. 06) इस जवाब को सुनकर वृद्ध को आश्चर्य होता है कि जिसका पति अरब कमाता हो उसकी पत्नी ऐसे बिना किसी गहने के और कपड़े नसीब भी हुए तो पेबन्द लगे, इस हालत में टूटे-फूटे घर में रहेगी। सकीना अपने इस एक टूटे-फूटे घर में अपने दो बच्चों के साथ रहती है। दिन भर मेहनत करने के बाद वो अपने बच्चों का पेट भर पाती है किन्तु साथ-ही-साथ उसे सदैव यह चिंता सताती रहती कि कब उसका पति समद अपनी दूसरी बीबी और बच्चों के साथ आए और उससे यह घर भी छीन ले जाए। तिरहुत मिथिलाँचल का एक ऐसा स्थान है जहाँ शादी, गौना, बच्चे का छट्ठी पूजन, मुंडन, जनेऊ आदि सभी रस्में बिना लहठी के पूर्ण नहीं माने जाते थे इसलिए वहाँ इन खास दिनों में लहेरिनों के द्वारा बनाए गये लहठी की मांग रहती। इसी लहठी का व्यापार करके सकीना अपना और अपने बच्चों का पेट भरती थी। सकीना की भाभी जैनब चूड़ियाँ बेचती थी जिससे उसे अधिक मुनाफा होता किन्तु इस व्यापार के लिए अधिक धन की जरूरत होती थी और सकीना के पास चूड़ियों के व्यवसाय के लिए पर्याप्त पैसे नहीं थे इसलिए सकीना लहठी बनाती थी जिसे किसी खास उत्सव या संस्कार पर लोगों में मांग होती थी। एक दिन जैनब ने सकीना को बताया कि बंगाली टोले में चौधरी जी की पोती का लगन है, जहाँ लहठी के ऑर्डर के लिए तुम्हें चौधरी जी के घर से बुलावा आया है। बंगाली टोले का नाम सुनकर अचानक सकीना को बचपन की बातें याद आने लग जाती है, जब वो अपनी बड़ी अम्मा मदीना और माँ हसीना के साथ बंगाली टोला चूड़ी बेचने साथ जाती थी। उस टोले में सिर्फ चौधरी जी का ही घर ऐसा था जहाँ छुआ-छूत और ऊँच-नीच का भेद भाव नहीं था, वहाँ सकीना को बचपन में सदैव कुछ न कुछ खाने को मिल जाता और जब तक हसीना चूड़ियाँ बेचती तब-तक सकीना चौधरी जी के आँगन में ही खेला करती। इस दृश्य के माध्यम से लेखिका ने सांप्रदायिक भेद-भाव से ऊपर उठकर समतामूलक समाज का चित्रण किया है। दूसरे दिन सकीना चौधरानी के घर जाने हेतु अपने लहठी की चूड़ियों से डलिया सजाकर तैयार करती है। सकीना को बंगाली टोला जाते वक़्त, वृद्ध इसे बड़े गौर से देखता है और यह अनुभव करता है कि सकीना की आँखें बिल्कुल अपनी माँ (हसीना) पर गई है साथ ही यह भी गौर करता है कि सकीना ने कोई गहने नहीं पहन रखे हैं किन्तु गहने पहनने का निशान जरूर है। वृद्ध व्यक्ति को यह देख अपनी पत्नी हसीना की याद आती है कि कैसे उसने हसीना के सारे गहने पूर्वी पाकिस्तान (अब बांग्लादेश) जाने के लिए ले लिए थे। बीती बात को याद कर उसमान (वृद्ध व्यक्ति/सकीना का पिता) भावुक होकर रोने लगता है- “ऐ अल्लाह, ऐ मौला अपनी करनी का फल सीधे दिखा रहे हो। पर मालिक एक गुजारिश है हसीना की बेटी को सुख देना। यह क्यों दुख काट रही है, इसका क्या दोष?” (पृ. 12)
उसमान अपने देकुली गाँव से पिता के साथ हसीना के गाँव तिकोन वाला लहठी पहुँचाने आता था। इस तिकोन वाली लहठी बनाने की कलाकारी सिर्फ उसमान के अब्बा को ही आता था जिसकी मांग सबसे अधिक दुर्गापूजा के वक़्त होती थी। शाहगंज में उसमान के पिता का एक मौसेरा भाई रहता था, जब कभी उसमान और उसके पिता को रात में रुकना होता तो वो उनके घर ही रुकता। उन्हीं के घर एक दिन उसमान की हसीना से शादी की बात पक्की हुई थी। कुछ समय बाद उसमान और हसीना की शादी हो जाती है और कुछ महीनों बाद ही उसमान हसीना को रुकसती कराकर अपने घर ले आता है। हसीना की सुंदरता देख उसमान बेहद खुश होता कि उसकी पत्नी पूरे गाँव में सबसे अधिक खूबसूरत है, इस तरह शादी के बाद दोनों प्रेमपूर्वक अपना जीवन व्यतीत करने लगते हैं। तिरहुत में हिन्दू और मुसलमानों के बीच दंगा-फसाद हुआ था जिससे किसी व्यक्ति ने उसमान को यह कह दिया कि तुम मुसलमानों का यह तिरहुत नहीं है तुम्हें पूर्वी पाकिस्तान चले जाना चाहिए। उसमान उस व्यक्ति की बातों में आ जाता है और पूर्वी पाकिस्तान जाने के लिए, गाँव की जमीन अपनी बहन को बेचकर कुछ पैसे एवं सिक्के इकट्ठा कर लेता है। हसीना माँ बनने वाली होती है इसलिए वो अपने मायके में होती है तो उसमान उससे मिलने उसके घर जाता है। वहाँ हसीना से मिलकर पूर्वी पाकिस्तान जाने की बात करता है- “हसीना, मैं तुमसे एक जरूरी बात करना चाहता हूँ ध्यान से सुनो चलो हम पाकिस्तान चलें। वहाँ के नये बने राज में हमारी बड़ी पूछ है यहाँ तो है ही नहीं। बत्तीस दाँत के बीच में कंकड़, पत्थर की तरह रहना होगा।” (पृ. 34) अपने देश को छोड़कर जाने की बात सुनते ही हसीना गुस्से में आग बबूला हो जाती है और उसमान से कहती है “तेरे पैर कुचल दूँगी। तुम्हारे साथ मैं जाऊँगी? उस राक्षसों के देस में? उस दानव दैत के जगह पर मुझे नहीं जाना। मैं अपनी माँ बहन के साथ रहूँगी तुम्हारे पीछे नहीं फिरूँगी।” (पृ. 35) हसीना की बात सुनकर उसमान गुस्से से पागल हो उठता है उसे लगता है कि गाय की तरह खूँटे से बाँधी गई औरत मेरी बात नहीं मानेगी और हसीना के बाल खींचकर गर्दन पर तब-तक प्रहार करता है जब-तक की हसीना बेहोश ना हो गई। उसमान को इस बात का जरा भी ख्याल नहीं था कि जिसे वो मार रहा है वो गर्भवती है। दूसरे दिन हसीना की माँ उसमान को समझाती है कि पहले आप जाकर वहाँ बस जाएँ फिर हसीना को बाद में लेकर जाइये क्योंकि अभी वो माँ बनने वाली है। उसमान हसीना की माँ से बोलता है कि वो घर और जमीन बेचकर भी जाने भर के पैसे इकट्ठा नहीं कर पाया है इसलिए वह हसीना के गहने की उम्मीद रखता है। हसीना अपने कमरे से उसमान की बातें सुन रही थी इसलिए वो अपने कान और नाक में पहने गहने के अलावा सारे गहने उसमान के समक्ष रख देती है। उसमान गहने लेकर वहाँ से चला जाता है और वापस मुड़कर हसीना को एक पल के लिए भी नहीं देखता है। जाते वक़्त उसमान मन ही मन यह सोचता रहा कि पूर्वी पाकिस्तान जाकर अपना कारोबार जमा लेगा तो हसीना एक समय के बाद खुद ही उसके पास आएगी, नहीं आएगी तो जाएगी कहाँ औरत जात जो ठहरी। पूर्वी पाकिस्तान जाने के बाद उसमान ने अपना कारोबार जमा लिया तो एक दिन उसमान को उसके साढ़ू भाई अहमद (हसीना की बहन मदीना का पति) का पत्र आता है कि हसीना ने एक पुत्री को जन्म दिया है। तुम आकर अपनी बीबी और बच्चों को ले जाओ किन्तु उसमान अपनी जिद पर अड़ा रहा। ऐसे ही उसमान को कुछ महीनों बाद अहमद का एक और पत्र आता है कि- “सास का इंतकाल हो गया, हसीना बेसहारा हो गई मैं कब-तक सहारा दूंगा? आखिर लोक लाज है कि नहीं? जवान जहान जनी जात है। आकर इज्जत-इकबाल से ले जाओ तुम्हारी औरत है। तुम्हारी इज्जत।” (पृ. 37) उसमान ने अहमद की चिट्ठी का कोई जवाब नहीं दिया। एक दिन उसमान की बहन ने सुझाया कि या तो हसीना को जाकर यहीं ले आओ या यहीं कोई लड़की देखकर शादी कर लो। उसमान को यह बात जच गई, पड़ोस में एक बिना बाल-बच्चों वाली विधवा लड़की थी उसी से उसमान की दूसरी शादी हो जाती है। इस तरह उसमान का हसीना को छोड़े हुए तीन साल बीत जाते हैं तो दरभंगा के एक मुल्ला द्वारा उसमान को रजिस्ट्री फरमान जाती है कि तीन साल तक आपने हसीना का कोई खोज-खबर नहीं लिया इसलिए आप उन्हें खुल्ला (तलाक) छोड़ दें। रजिस्ट्री का फरमान सुनकर उसमान को अचानक हसीना के साथ किए जुल्म का एहसास होने लगता है और साथ ही अपनी बेटी को देखने के लिए भीतर ही भीतर तड़पने लगता है। उसमान अपने मन में ही यह विचार करता है कि वो इस बार का बकरीद अपने देश में मनाएगा और अपनी बेटी से भी मिल लेगा एवं कोई न कोई उपाय करके हसीना को वापस अपने पास ले आएगा। उसमान सोचता है कि मेरे पास इतनी संपत्ति है किन्तु अपनी बेटी को अभी तक कुछ नहीं दे पाया इसलिए वो अपनी बेटी के लिए कुछ सोने के गहने बनवाकर अपने कच्छे में सदैव बाँधे रहता। किन्तु अल्लाह की मर्जी के आगे उसमान की मर्जी नहीं चल पाई। एक दिन उसमान को एक और पत्र मिलता है जिसमें लिखा होता है कि- “उसमान मियाँ के मालूम जे ओकरे तीनों भांजे का सुन्नत है आ जाए। आखिरी पंक्ति लिखी थी...तुम्हारी बेरुखी से दुखी, खाना खोराक के लिए तरसती हसीना खुल्ला कराने के छः माह बाद तक आसरा देखती रही। तुम नहीं आये। तब अपने ही बहनोई अहमद मियाँ की ब्याहता बन गई। अहमद मियाँ कंधे पर सकीना को बैठाकर लहेरीगंज में ‘रौण्ड’ लगाते रहते हैं जैसे सकीना उनकी ही बेटी है उसमान की नहीं।” (पृ. 39)
पूर्वी पाकिस्तान में उसमान जहाँ अपने नए परिवार के साथ रह रहा था वहाँ पूर्वी पाकिस्तान को बंगलादेश बनाने के लिए सभी जगह दंगे-फसाद होने लगे थे। उसी दंगे का शिकार उसमान का पूरा परिवार बन जाता है, जिसमें सिर्फ उसमान जीवित रह जाता है। अपने पूरे परिवार की लाश को देखकर उसमान संज्ञा शून्य हो होता है। धीरे-धीरे उसमान की खोई चेतना वापस आती तब उसे पीछे छोड़ हुआ परिवार हसीना की याद आती है। आज वही उसमान को सकीना के घर का छाँव मिला है जिसे उसमान ने हसीना के गर्भ में ही छोड़कर पूर्वी पाकिस्तान चला गया गया था। आज भी अपनी बेटी के लिए बनाए गहने को उसमान अपने कच्छे में बाँधे हुए है और उसकी बेटी सामने भी है पर वो गहने उसे दे नहीं पता। उसमान को लगता है कि वो किस मुँह से सकीना को यह बताए कि वो उसका अब्बा है, जो उसे माँ के पेट में ही छोड़कर चला गया था। उसमान को यह डर भी सालने लगता है कि कहीं उसकी सच्चाई जानकर सकीना उसे अपने पास से दूर न कर दे इसलिए उसमान अपनी पहचान को छिपाए ही रहता है।
इधर सकीना बंगाली टोला पहुँच जाती है जिस घर में उसे लाह की लहठियों का नाप लेना था, नाप लेने के बाद सकीना अपने घर को आ जाती है। उसमान अपने पिता से तिकोन वाली लहठियाँ बनाना सिखा था जिसकी लोकप्रियता तिरहुत में काफी ज्यादा प्रसिद्ध थी किन्तु उसमान के पिता की मृत्यु के बाद तिरहुत में तिकोन वाली लहठियों का मिलना बंद हो गया था। वही तिकोन वाली लहठियाँ उसमान अपनी बेटी सकीना को बनाकर देता है जिसे बंगाली टोला वाली शादी में खूब पसंद किया जाता है। एक दिन उसमान ने सकीना को मेले में अपनी दुकान लगाने की सलाह देता है, यह सलाह सकीना को भी अच्छा लगता है। मेले में आए पत्रकारों ने हसीना की हस्तकला का अनोखा रूप अखबारों में छाप दिया। रातों-रात सकीना की काठ के लहठियों की लोकप्रियता बढ़ जाती है और धीरे-धीरे देखते ही देखते सकीना उसमान की मदद से अपना एक अच्छा खासा लहठियों का व्यापार जमा लेती है। अब सकीना के पास बड़े-बड़े लोगों का ऑर्डर आने लगा था। कुछ दिनों बाद सकीना को सरकार के तरफ से एक चिट्ठी प्राप्त होती है जिसमें लोक कला के विशेष ज्ञान के लिए सकीना को मुख्यमंत्री द्वारा 15 अगस्त को पुरस्कृत किए जाने का उल्लेख था। सकीना और उसमान को इस बात पर विश्वास ही नहीं होता किन्तु सकीना का बेटा हसमत बहुत खुश होता है कि उसकी माँ को भारत सरकार द्वारा पुरस्कार दिया जाएगा। 16 अगस्त को भारत सरकार द्वारा सकीना को पुरस्कृत किया जाता है। अपने पति की मदद के बिना भी सकीना अपना स्वतंत्र व्यवसाय कर आर्थिक रूप से स्वावलंबी बनती है और अपने पूरे परिवार का अच्छे से भरण-पोषण भी करती है। इस प्रकार सकीना अपनी लाह की लहठियों के साथ-साथ अपने अस्तित्व की भी लड़ाई लड़ रही थी जिसमें वो सफल होती है।
इस प्रकार उषाकिरण खान ने इस उपन्यास में लहेरिनों के जीवन का संघर्ष एवं मातृभूमि के प्रति प्रेम को दर्शाने में सफल होती हैं। सकीना के माध्यम से लेखिका ने यह दर्शाया है कि कैसे एक अकेली स्त्री अपनी पूरी संघर्ष के साथ स्वावलंबी बनती है और अकेले ही दम पर अपने परिवार का भरण-पोषण भी करती है।
पुस्तक - हसीना मंज़िल
प्रकाशक - वाणी प्रकाशन
संस्करण - 2012
मूल्य - 200
पृष्ठ - 88
चमचम रॉय
शोधार्थी, पंजाब केंद्रीय विश्वविद्यालय
बठिंडा, पंजाब
ई-मेल – chamchamroy305@gmail.com