मगही लोकगीतों में स्त्री-स्वर
लोकगीत का अर्थ एवं परिभाषा
‘लोक’ एवं ‘गीत’ इन दो शब्दों के योग से लोकगीत बना है, जिसका शाब्दिक अर्थ है- ‘लोक के गीत’। ‘लोक’ शब्द एक ऐसे वर्ग को संबोधित करता है जो आभिजात्य शिक्षा से दूर तथा सुसंस्कृत लोगों के प्रभाव से दूर अपनी पुरातन परम्परा में विद्यमान रहते हैं। इसी प्रकार ‘गीत’ शब्द का अर्थ उस कृति से है जो गेय हो। ‘दीपशिखा’ में ‘गीत’ शब्द को स्पष्ट करते हुए महादेवी वर्मा कहती हैं कि ‘व्यक्तिगत सीमा में तीव्र सुख-दुखात्मक अनुभूति का वह शब्द रूप गीत है जो अपनी ध्वन्यात्मकता में गेय हो सके।’ लोकगीत की परिभाषा देते हुए डॉo सूर्यकरण पारीक कहते हैं कि- “आदिम मनुष्य-हृदय के गानों का नाम लोकगीत है। मानव-जीवन की, उसके उल्लास की, उसकी उमंगों की, उसकी करुणा की, उसके रुदन की, उसके समस्त दुःख-सुख की कहानी इनमें चित्रित है।” (डॉo सुरेश गौतम, लोक साहित्य, संजय प्रकाशन, दिल्ली, संस्करण 2022, पृ. 67)
लोकगीतों की परंपरा
लोकगीतों की परंपरा का शुरुआत मूलतः मानव सृष्टि निर्माण के प्रारम्भिक चरण से ही हो गया था। ‘ध्वनि’ तो सबको मिली जैसे- मनुष्य, पेड़-पौधे, पशु-पक्षी, जल-प्रवाह आदि किन्तु मनुष्य ने उस ‘ध्वनि’ को अर्थ दिया, जिससे ‘शब्द’ का निर्माण हुआ। इस प्रकार शब्दों के योग से गीत बना एवं इसी गीत के माध्यम से मानव ने अपने जीवन के सुख-दुख को व्यंजित किया। हमारे समक्ष साहित्य का प्रथम रूप गीत रूप में ही आता है। वैदिक युग का ‘ऋग्वेद’ सबसे प्राचीनतम साहित्य है, जिसमें हमें लोकगीत का रूप देखने को मिलता है। वैदिक साहित्य में हमें पुत्र-जन्म, यज्ञोपवीत, विवाह एवं उत्सवों आदि पर मनोहारिणी गायन का उल्लेख मिलता है। इन गीतों का मनोहारिणी वर्णन वाल्मीकि रामायण में राम-जन्म एवं श्रीमद्भागवत् के दशम् स्कन्ध में कृष्ण-जन्म के प्रसंग में भी हमें देखने को मिलता है। वैदिक साहित्य में रचित ‘गाथा सप्तशती’ लोकगीतों का ऐसा उदाहरण है, जिसमें तद्युगीन लोकजीवन का सजीव चित्र गीतों के माध्यम से उकेरा गया है।
इसी क्रम में परम्परा से चले आ रहे स्त्रियों के गीतों को वररुची ने संग्रह किया एवं 12वीं सदी के आस-पास ‘विज्जका’ नाम की एक कवयित्री ने महिलाओं के श्रम करते हुए चित्र को अपने गीतों के माध्यम से प्रस्तुत किया है। इनके द्वारा धान कूटने वाली स्त्रियों का चित्रण बड़ा ही रोचक है-
विलासमसृणोल्लसन्मुसललोलदोः कंदली-
परस्परपरिस्खलद्वलयनिः स्वनोद्बन्धुराः ।
लसन्ति कलहुंकृतिप्रसभकंपितोरः स्थल-
त्रुटद्गमकसंकुलाः कलभगण्डनी गीतयः ।।
(लोक साहित्य की भूमिका, कृष्णदेव उपाध्याय, लोकभारती प्रकाशन, इलाहाबाद, प्रथम लोकभारती संस्करण: 2019, पृ. 26)
वैदिक काल से लोकगीत निरंतर चलते हुए एवं परिवर्तित होते हुए हिन्दी साहित्य के आदिकाल में भी अपना स्थान बनाता है। इसका स्वरूप ‘कीर्तिलता’ के ‘भृंग-भृंगी’ एवं ‘पृथ्वीराजरासो’ में ‘शुक-शकी’ संवाद आदि में देखे जा सकते हैं। कृष्ण भक्तिकाव्य के कवि सूरदास द्वारा रचित ‘सूरसागर’ एक गीतकाव्य ही है। ‘सूरसागर’ के बारे में आचार्य रामचन्द्र शुक्ल कहते हैं कि- ‘सूरसागर किसी चली आती हुई गीतकाव्य-परंपरा का, चाहे वह मौखिक ही रही हो-पूर्व विकास सा प्रतीत होता है।’ (आचार्य रामचन्द्र शुक्ल, हिन्दी साहित्य का इतिहास, आठवाँ संस्करण, पृ. 65)
लोकगीतों की यह परंपरा प्राचीन और मध्य काल से निरंतर प्रवाहित होते हुए एवं युग के साथ-साथ नामों को परिवर्तित करते हुए अपनी महत्ता को आधुनिक काल में भी बनाए रखते हैं। ये वैदिक काल में गाथा तत्पश्चात्य ग्रामगीत एवं आधुनिक काल में नवगीतों के नाम से अभिहित किये गए। आधुनिक हिन्दी साहित्य के पितामह कहे जाने वाले भारतेन्दु भी इस लोकगीत की परंपरा से अछूते न रह सके। उदाo-
“सिखाय नाहीं देत्यौ, पढ़ाय नाहीं देत्यौ, सैयां फिरंगिन बनाय नाहीं देत्यौ।
कोठवा अटरिया मोहिं नीको न लागै, नदिया पै बंगला छवाय नाहीं देत्यौ।।”
छायावादी काव्य में भी हमें लोकगीतों की झाँकिया देखने को मिल जाती है। लोकधुनों का प्रयोग करने वाले लेखकों में प्रायः निराला एवं महादेवी वर्मा का नाम उल्लेखित किया जाता है। परवर्ती कवियों में गीतों का संकलन करने वालों में हरिवंशराय बच्चन का नाम महत्वपूर्ण है। इनकी रचना ‘त्रिभंगिमा’ और ‘चार खेमे और चौसठ खूंटे’ में हमें लोकगीतों के कुछ उदाहरण देखने को मिल जाते हैं। आधुनिक काल में लोकगीतों की लोकप्रियता इतनी अधिक हुई कि इससे सिनेमा जगत भी अछूती नहीं रही। इस प्रकार से लोकगीतों की धारा आज भी प्रवाहमान है। लोकगीतों का विकास मानव सृष्टि से प्रारंभ होकर उसके मृत्यु तक निरंतर चलता रहता है।
मगही लोकगीतों में स्त्री स्वर
विकसित राष्ट्रों के द्वारा शुरू किया गया वैश्वीकरण और ग्लोबलाइजेशन के अभियान से स्थानीयता अर्थात् लोकल को खतरा दिन-प्रतिदिन बढ़ता ही जा रहा है। इसलिए संवेदनशील लोगों के द्वारा लोक से जुड़ी अस्मिताओं की पहचान के साथ-साथ उसके संरक्षण पर भी आवाज उठाए जाने लगे हैं। अस्मिताओं की पहचान और संरक्षण के संदर्भ में सबसे पहले हमारी नज़र लोक साहित्य की ओर केंद्रित होता है क्योंकि इसमें हमारी सांस्कृतिक अस्मिता का सच्चा प्रवाह होता है, जिसे संरक्षित करना अति आवश्यक हो जाता है। एक ओर शिष्ट समाज ने जो कुछ भी सीखा, उसे लिपिबद्ध कर अपने ज्ञान की परंपरा को सुरक्षित किया तो वहीं दूसरी ओर शिक्षा से वंचित सामान्य जनता ने अपनी परंपराओं को, संस्कारों को, रीति-रिवाजों को एवं संस्कृति को- लोकगीतों, लोककथाओं एवं लोकनाटकों के माध्यम से सुरक्षित रखने का प्रयास किया। कृष्णदेव उपाध्याय के शब्दों में- “किसी देश के लोकगीत उस देश की जनता के हृदय के उद्गार हैं। वे उनकी हार्दिक भावनाओं के सच्चे प्रतीक होते हैं। यदि किसी देश की सभ्यता का अध्ययन करना हो, तो सर्वप्रथम उनके लोकगीतों का अध्ययन करना होगा। लोकगीत लोकमानस की वस्तु है, अतः उनमें जनता का हृदय लिपटा रहता है।”
लोक साहित्य का अभिन्न अंग लोकगीत के निर्माण में पुरुषों की अपेक्षा स्त्रियों का योगदान अधिक रहा है। इन लोकगीतों में स्त्रियों के सदियों से झरते मन के अथाह दर्द, पीड़ा, प्रेम, आशा, आकांक्षा, प्रताड़ना आदि को देखा जा सकता है। स्त्रियों ने जीवन के विभिन्न परिस्थितियों में भाव और अभाव को स्वर देकर लोकगीतों के माध्यम से अपनी संवेदनाओं को प्रकट किया है। पितृसत्तात्मक व्यवस्था में जकड़ी स्त्री का रुदन इन लोकगीतों में दर्ज है जो कभी सवाल बनकर नहीं उभरा। लोकगीतों में दर्ज़ स्त्री की शिकायतनामा यह दिखाता है कि समाज में स्त्रियों की दशा कैसी थी ? इन लोकगीतों की रचना- पुत्र एवं पुत्री का भेद, सास-ननद का भय, संतानहीन स्त्री का दु:ख, दहेज प्रथा, धान कूटते समय की थकान, गेंहूँ पीसते समय की थकान, खेत में काम करते समय की थकान, बाल्यावस्था में विवाह के बंधन में बंध जाना, पति का विरह और प्रेम, विधवा स्त्री का जीवन, गरीबी और अभाव आदि विषय को केंद्र में रखकर रचे गए हैं। सोहर, झूमर, बारहमासा, क्रिया-गीत आदि सभी प्रकार के गीतों में स्त्रियों ने अपने सुखों और दुखों को अभिव्यक्त किया है, जो बहुत ही हृदयस्पर्शी एवं संवेदनशील है।
भारतीय समाज की यह सच्चाई है कि जिस घर-परिवार में लड़की जन्म लेती है वही उसका अपना नहीं होता, वही घर उसे पराई धरोहर कहती है। विवाहोपरांत जब कन्या ससुराल जाती है तो वहाँ आत्मीयता के अभाव में अपने मायके को हीं याद करती है; किन्तु अब वह वहाँ सिर्फ मेहमान की हैसियत मात्र रखती है। मायके के प्रति हुलस, सास-ननद का भय एवं दोनों पक्षों में एक दूसरे के प्रति कड़वापन भारतीय समाज की विडंबना को ही दर्शाती है। मगही लोकगीत में पिता के घर से बिछुड़ने पर एक पुत्री की वेदना के स्वर का चित्रण अत्यंत मार्मिक है, जिसे हम निमलिखित पंक्तियों के माध्यम से देख सकते हैं-
नइहरा के सुखबा परभु जी कइसे बिसरब हे।
उहाँ सुपती मउनी कइसे खेलब हे।।
पुत्र के स्थान पर जब एक कन्या जन्म लेती है तो घर-परिवार में खुशी के जगह करुणा अपना स्थान बना लेती है। कारुणिक माहौल के पीछे दहेज जैसी समाज में फैली कुप्रथा है, जिससे कन्या जन्म पर शोक एवं चिंता स्थान लेती है। हमारे समाज के कई ऐसे प्रांत या गाँव हैं जहाँ एक स्त्री का सम्मान पुत्र जन्म देने से होता है एवं पुत्री जन्म पर पूरे परिवार द्वारा उपेक्षित और तिरस्कृत की जाती है। इस संदर्भ में डॉ० महाश्वेता चतुर्वेदी का कथन दृष्टव्य है- “पुत्रोत्पत्ति पर हर्ष तथा पुत्री के जन्म पर दुखी होने का मनोवैज्ञानिक कारण दहेज और विवाह की समस्या है।” इस संदर्भ में मगही गीत का एक उदाहरण दृष्टव्य है, जिसमें पति अपनी पत्नी से जन्मोत्सव के बारे में पूछता है तो उसके उत्तर में स्त्री अपनी दीनता बतलाती हुई कहती है कि मेरे जन्म की सूचना पाकर घर के सभी सदस्य दुखी हो गए थे-
जाही दिन अजी परभु, हमरो जलम भेल, बाबा सुतल चदरी तान।
झोंकि दिहल चेरिया मिरचा के बुकनी सउरी में पड़ल हरहोर।।
बाबा जे जड़लन बजड़ केमड़िया मामा उठल भउराय।
गड़ल गड़ुअवा हमर उखड़ावल, होइ गेलन जीउ जंजाल।।
सुख-दुख के सहभागी स्त्री-पुरुष, पुत्र के अभाव में दोनों समान रूप से दुखित होते हैं किन्तु समाज इसके लिए सदैव एक स्त्री को ही जिम्मेदार मानता है। इस पर यदि उसका सहभागी पति भी अवहेलना करे तो यह दुख एक स्त्री के लिए असहनीय हो जाता है। निम्नलिखित मगही गीतों में इसका अत्यंत मार्मिक चित्रण हुआ है, जिसमें पत्नी-पति से अनुरोध करती है कि अगर आप आम का पेड़ लगाते तो मैं मीठा फल खाती, इस पर पति कहता है कि अगर तुम पुत्र को जन्म देती तो मैं सोहर सुनता। इस अप्रत्याशित उत्तर को सुनकर पत्नी दुखी हो जाती है-
धनिया, जे तुहुँ सुघरि धनिया, सुनहु बचन मोरा ए।
धनिया, एक तुहुँ बेटवा पभइतऽ, त सोहर हम सुनती हे।।
इस प्रकार से हमें यह देखने को मिलता है कि लोक साहित्य का एक अभिन्न अंग के रूप में चले आ रहे लोकगीतों का महत्व अत्यंत महत्वपूर्ण है। इसमें किसी विशेष क्षेत्र के इतिहास तथा धर्म और समाज से संबंधित अमूल्य सामग्री मौजूद है जिसके संकलन, संरक्षण एवं अनुशीलन से साहित्य की समृद्धि होती है। लोकगीतों के रचनाकार जो यथार्थ देखते हैं, उसी को अपनी आवाजों में सहज रूप से पिरोते हैं इसलिए ये सच के अधिक निकट जान पड़ते हैं। इन लोकगीतों में मनुष्यों के आचार-व्यवहार, रहन-सहन, खान-पान, दुख-सुख आदि का यथार्थ चित्रण हुआ है जो कहीं भी उपलब्ध होना कठिन है। इन्हीं लोकगीतों के माध्यम से स्त्रियों ने अपने मन के भावों को व्यंजित किया है जो उसके दुख और सुख का परिचायक है।
संदर्भ:
1. डॉ० राम प्रसाद सिंह, मगही लोक गीत के वृहद संग्रह, मगही अकादमी बिहार, पटना, प्रथम संस्करण 1999
2. डॉ० विश्वनाथ प्रसाद, मगही संस्कार गीत, बिहार-राष्ट्रभाषा-परिषद, पटना, 2005
3. कृष्णदेव उपाध्याय, लोक संस्कृति की रूपरेखा, लोकभारती प्रकाशन, प्रयागराज, 2021
4. डॉ. नारायण चौधरी, लोक साहित्य के स्वरूप का सैद्धांतिक विवेचन, चंद्रलोक प्रकाशन, कानपुर, प्रथम संस्करण 2009
5. चन्द्रकला भण्डारी, लोकगीतों में स्त्री, प्रवाह पत्रिका, दिसंबर 2017-फरवरी 2018
6. हिन्दी समय डॉट कॉम.
चमचम रॉय
शोधार्थी (हिन्दी विभाग)
पंजाब केन्द्रीय विश्वविद्यालय, बठिंडा
ईमेल- chamchamroy305@gmail.com