भोजपुरी भाषा का इतिहास और विस्तार

 

            आचार्य रामचंद्र शुक्ल हिन्दी साहित्य का इतिहास लिखते समय जब हिन्दी के इतिहास का विभाजन करते हैं और जिन बातों की ओर ध्यानाकर्षण करते हैं। वही बातें कुछ हद तक भोजपुरी के संदर्भ में भी लागू हो सकती हैं। वे लिखते हैं, "जबकि प्रत्येक देश का साहित्य वहां की जनता की चित्तवृत्ति का संचित प्रतिबिंब होता है, तब यह निश्चित है कि जनता की चित्तवृत्ति के परिवर्तन के साथ-साथ साहित्य के स्वरूप में भी परिवर्तन होता चला जाता है। आदि से अंत तक इन्हीं चित्तवृत्तियों की परंपरा को परखते हुए साहित्य परंपरा के साथ उनका सामंजस्य दिखाना ही साहित्य का इतिहास कहलाता है।"1.

           यदि इन चित्तवृत्तियों के मद्देनजर देखें तो हम पायेंगे कि भोजपुरी के संदर्भ में भी ये बातें सच नज़र आती हैं और वो इसलिए कि भोजपुरी का इतिहास-क्रम भी हिन्दी के इतिहास-क्रम के साथ-साथ ही एक यात्रा करता प्रतीत होता है। इन चित्तवृत्तियों को नज़दीक से देखने और समझने पर आभास होता है कि भोजपुरी के इतिहास पर भी हिन्दी के इतिहास जैसे ही बातें की जा सकती हैं।

इतिहास:

           भोजपुरी के इतिहास और नामकरण के विषय में जिस प्रकरण पर विद्वान् एकमत हैं, वो है भोजपुरी का बिहार के भोजपुर नामक स्थान से जुड़े होना। इसी भोजपुर के वजह से यहां की बोली जाने वाली भाषा का नाम भोजपुरी पड़ा माना जाता है। इतिहास से सिद्ध होता है कि मालवा के राजवंशों का बिहार के इस पश्चिमी भाग पर अधिकार था और ये लोग राजा भोज के वंशज थे। अतः ये लोग अपने नाम के साथ भोज की उपाधि भी धारण करते थे। वही इन लोगों ने जिस नगर को अपनी राजधानी बनाया, उसका नाम भोजपुर रखा। इसलिए उस स्थान से जुड़ी भाषा को आज भोजपुरी के नाम से अभिहित किया जाता है। भोजपुर की भाषा अर्थात् भोजपुरी।

        वैसे भोजपुरी के शुरुआती रूप 7वीं शताब्दी से मिलने लगता है। भोजपुरी पहली बार बड़े पैमाने पर सिद्ध साहित्य में स्पष्ट होकर आता है। बाद में कबीरदास आदि के वाणियों में भी भोजपुरी का प्रभाव परिलक्षित होता है। भोजपुरी में साहित्य का प्रारंभिक स्वरूप 8वीं से 11वीं शताब्दी के मध्य मिलता है। जिनमें सरहपा, शबरपा, भुसुकपा, डोंभिपा, कुक्कुरिप्पा आदि प्रसिद्ध सिद्ध व नाथ पंथी कवि हैं। इनकी कविताओं में भोजपुरी के संज्ञा और क्रिया पद दिखाई पड़ते हैं। जिनको देख कर ये कहना ज़रूरी जान पड़ता है कि भोजपुरी का इतिहास एक लंबे अरसे का इतिहास है। इससे पता चलता है कि भोजपुरी का उद्भव व विकास बहुत पहले ही हो गया था।

           भोजपुरी के काल विभाजन करते समय ये ध्यान रखने की ज़रूरत है कि अमूमन इसका काल विभाजन हिन्दी के काल विभाजन के तर्ज़ पर ही हुआ है। क्योंकि विकास की एक प्रक्रिया जो एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक जाती है, उसका एक प्रभाव भोजपुरी के काल विभाजन में भी मिलता है और वो है हिन्दी से काल विभाजन के प्रक्रिया को अपनाना। जिन विद्वानों ने भोजपुरी का काल विभाजन किया है। उनके काल विभाजन को आगे देखा जा सकता है - कृष्णदेव उपाध्याय अपनी पुस्तक "भोजपुरी और उसका साहित्य" में भोजपुरी का काल विभाजन ऐसे करते हैं :2.

1. संत साहित्य

2. लोक साहित्य

3. आधुनिक साहित्य

4. प्रकीर्ण लोक काव्य संग्रह

श्री दुर्गा प्रसाद सिंह अपनी पुस्तक " भोजपुरी के कवि और काव्य" में भोजपुरी का काल विभाजन ऐसे करते हैं:3.

1. प्रारंभिक अविकसित काल (सिद्ध काल) 700 ई. से 1100 ई.

2. आदिकाल (ज्ञान प्रचार काल तथा वीर काल) 1100 ई. से 1325 ई.

3. पूर्व मध्यकाल (भक्ति काल) 1325 ई. से 1650 ई.

4. उत्तर मध्यकाल (रीति काल) 1650 ई. से 1900 ई.

5. आधुनिक काल (राष्ट्रीय काल और विकास काल) 1900 ई. से 1950 ई.

                इस प्रकार हम देखते हैं कि विभिन्न विद्वानों ने अपने अनुसार भोजपुरी भाषा और साहित्य का विभाजन किया है। इस आधार पर ये कहा जा सकता है कि किसी भी साहित्य के निर्माण और विकास में तत्कालीन राजनीतिक, धार्मिक, आर्थिक और सामाजिक दशाओं का प्रभाव मिलता है और भोजपुरी के बारे में भी काफ़ी हद तक ये सही प्रतीत होता है।

           इन काल विभाजनों के बाद एक महत्त्वपूर्ण बात की तरफ ध्यान देने की ज़रूरत है और वो ये कि भोजपुरी का काल विभाजन लगभग हिन्दी साहित्य के काल विभाजन के अनुरूप किया गया है। किंतु ये नहीं भूलना चाहिए कि हर भाषा की अपनी विशिष्टता और प्रदेय होता है। जो अमूमन अन्य से अलग ही होता है। अतएव जब भोजपुरी के इतिहास का काल विभाजन हम हिन्दी के परिपाटी पर करना चाहेंगे तो उलझ जाएंगे और बेहतर ढंग से कर सकने में असमर्थ होंगे। जैसे कि भोजपुरी में रीति काल और काव्य का कोई विशेष प्रभाव परिलक्षित नहीं होता जबकि हिन्दी में ये एक महत्त्वपूर्ण बिंदु है। अतः भोजपुरी का काल विभाजन करते समय हमें सावधानी बरतनी चाहिए।

            किसी भी साहित्य के इतिहास पर बात करते समय ये ध्यान रखना चाहिए कि उसका मूल कैसे विकसित हुआ? और जब ये ज्ञात हो जाए तब उसके इतिहास की रूपरेखा तैयार करनी चाहिए। जिससे एक-एक बातों और घटनाओं को क्रम से और वो भी साहित्यिक कसौटियों पर कसते हुए रखा जा सके। क्योंकि भाषा में लिखी हर एक बात साहित्य के अंतर्गत नहीं आती। यदि भोजपुरी के बारे में कहा जाए तो भोजपुरी का इतिहास भी इन कसौटियों पर कसा जाना चाहिए तभी उसकी प्रासंगिकता का अंदाज़ा लगाया जा सकेगा। क्योंकि ये कसौटियां ही वे पैमाने बनेंगी, जो भोजपुरी के इतिहास को सही दिशा दे सकने में सक्षम होंगी। अर्थात् भोजपुरी का इतिहास भी एक व्यवस्थित क्रम को प्राप्त करने में समर्थ हो सकेगा। जिसके परिणामस्वरूप उसे और क़रीब से जाना और समझा जा सकेगा।

विस्तार:

             भोजपुरी भाषी क्षेत्र के संबंध में पहले पहल जिस विद्वान् ने महत्त्वपूर्ण कार्य किया। वे जी. ए. ग्रियर्सन थे। वे ‘लिंग्विस्टिक सर्वे ऑफ़ इंडिया’ में लिखते हैं, “भोजपुर परगने के नाम पर भोजपुरी भाषा का नाम पड़ा है। यह भोजपुर सीमा के आगे बहुत दूर तक बोली जाती है। उत्तर में यह गंगा को पार करके नेपाल की सीमा के ऊपर हिमालय की निचली पहाड़ियों तक चंपारण जिले से लेकर बस्ती तक फैली हुई है। दक्षिण में सोन पार करके यह छोटा नागपुर के विस्तृत रांची के पठार तक फैलती है। मानभूम जिले के छोर पर यह बंगाली और सिंहभूम जिले के छोर पर ओड़िया के संसर्ग में आती है।”4.  वैसे ग्रियर्सन साहब के बाद भी बहुत लोगों ने भोजपुरी के विस्तार पर बात किया और अभी भी कर रहे हैं। उनमें एक बड़ा नाम जिन्हें सभी लोग लेते हैं, वे हैं डॉ. उदय नारायण तिवारी जो अपनी पुस्तक "भोजपुरी भाषा और साहित्य" में लिखते हैं कि "भोजपुरी पूर्वी अथवा मागधी परिवार की सबसे पश्चिमी बोली है। ग्रियर्सन ने पश्चिमी मागधी को बिहारी के नाम से अभिहित किया है। बिहारी से ग्रियर्सन का उस एक भाषा से तात्पर्य है जिसकी मगही, मैथिली तथा भोजपुरी तीन बोलियां हैं।"5.  यानि कि डॉ. उदय नारायण तिवारी जिस बात की ओर संकेत करते हैं, उससे पता चलता है कि भोजपुरी का मूल क्षेत्र बिहार है और भौगोलिक तौर पर देखा जाए तो आज के दौर में इसका वृहत् स्तर पर विस्तार हुआ है। साथ ही वर्तमान परिदृश्य में देखा जाए तो भोजपुरी का विस्तार पश्चिमी बिहार, पूर्वी उत्तर प्रदेश, पश्चिमी झारखण्ड, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ के उत्तर-पूर्वी भाग एवं नेपाल के तराई तक है।

           वैसे नेपाल के तराई क्षेत्र को छोड़कर ये क्षेत्र अमूमन भारत में ही हैं लेकिन भारत के बाहर भी भोजपुरी बड़े पैमाने पर बोली जाती है। भारत के बाहर जिन स्थानों पर भोजपुरी बोली जाती है, उनके नामों का ज़िक्र करें तो सूरीनाम, गुयाना, त्रिनिदाद और टोबैगो, फ़िजी और मौरिशस आदि भोजपुरी समझने और बोलने वाले क्षेत्र के अंतर्गत आयेंगे। इन महत्त्वपूर्ण देशों के अलावे भी जिन अन्य देशों में भोजपुरी बोली और समझी जाती है वे देश मुख्यतः सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात, दक्षिण अफ्रीका और अमेरिका हैं।

यदि भारत के उन ख़ास स्थानों व जिलों की बात की जाए, जहाँ की मुख्य बोली भोजपुरी है तो विकिपीडिया पर दिए स्रोत के अनुसार उनके नाम राज्यवार ये होंगे:6.

बिहार: बक्सर, छपरा, सिवान, गोपालगंज, पूर्वी चंपारण, पश्चिमी चंपारण, वैशाली, भोजपुर, रोहतास, और भभुआ।

उत्तर प्रदेश: वाराणसी, बलिया, चंदौली, गोरखपुर, महाराजगंज, गाजीपुर, मिर्जापुर, मऊ, जौनपुर, बस्ती, संत कबीर नगर, सिद्धार्थ नगर, आजमगढ़, देवरिया और कुशीनगर।

झारखण्ड: पलामू और गढ़वा।

इसके साथ ही भोजपुरी बोलने वाले लोगों की संख्या की बात करें तो वर्ष 2011 के जनगणना के अनुसार भारत में 6 करोड़ भोजपुरी बोलते हैं। वहीं विश्व के समूचे हिस्से के लोगों को लेकर कहा जाए तो भोजपुरी बोलने और समझने वालों की संख्या लगभग 20 करोड़ के आसपास ठहरेगी।

 

संदर्भ ग्रंथ सूची :

1. आचार्य रामचंद्र शुक्ल, हिन्दी साहित्य का इतिहास, लोकभारती प्रकाशन, इलाहाबाद, आठवां संस्करण 2012, पृष्ठ1

2. कृष्णदेव उपाध्याय, भोजपुरी और उसका साहित्य, राजकमल प्रकाशन, दिल्ली, प्रथम संस्करण 1957, पृष्ठ 35

3. श्री दुर्गाप्रसाद सिंह, भोजपुरी के कवि और काव्यबिहार राष्ट्रभाषा परिषद, पटना, प्रथम संस्करण 1958, पृष्ठ 32

4. सर जी. ए. ग्रियर्सन, लिंग्विस्टिक सर्वे ऑफ़ इंडिया (भाग 5), गवर्नमेंट प्रेस, कलकत्ता, 1902, पृष्ठ 40

5. उदय नारायण तिवारी, भोजपुरी भाषा और साहित्य (पहला अध्याय), बिहार राष्ट्रभाषा परिषद, पटना, प्रथम संस्करण 1954, पृष्ठ1

6. https://hi.m.wikipedia.org

 

कार्तिकेय शुक्ल

लेखक, शोधार्थी

हैदराबाद विश्वविद्यालय, हैदराबाद

ईमेल – kshuklahindi1999@gmail.com