एक लंबे अंतराल के बाद जब मैंने दोबारा लिखना शुरू किया तो कई लोगों ने मुझसे सवाल किए। उन सभी में सबसे आम सवाल यही था… “तुम्हें कैसे एहसास हुआ कि अब लिखना चाहिएलिखने का सही समय क्या होता है?”

उस वक्त मेरे पास कोई जवाब नहीं था। पर एक हफ़्ते के आत्ममंथन के बाद विचार आया कि क्यों न अगला लेख इसी विषय पर लिखा जाए कि आख़िर लिखने का सही समय क्या होता है?

इस सवाल का जवाब अगर एक पंक्ति में दूँ तो शायद वह पल... जब भीतर कोई विचार चुपचाप करवटें बदल रहा हो।

थोड़ा विस्तार से कहूँ तो वह पलजब कोई अनुभवकोई स्मृतिकोई सवाल या कोई बेचैनी शब्दों का रूप लेकर बाहर आना चाहती होजब मन के भीतर सिमटी आवाज़ कागज़ पर उतरने के लिए व्याकुल हो उठे। मेरे लिए तो लिखने का सही समय हमेशा वही रहा है… जब न लिखनालिखने से कहीं अधिक कठिन लगने लगे।

मुझे याद हैबचपन में जब पहली बार हाथ में पेंसिल आई थीतब यह नहीं मालूम था कि उससे करना क्या है। बस इतना पता था कि पिता की डाँट से बचने के लिए कॉपी पर कुछ न कुछ लिखते रहना चाहिए। मैं कोरे कागज़ों पर लकीरें खींचता थाआकृतियाँ बनाता था और समझता था कि शायद यही लिखना है।

फिर स्कूल का दौर आया। वहाँ अध्यापकों ने कहा, “लिखना तो सीख गए होअब सुलेखन सीखो।” उस समय कर्सिव राइटिंग का बड़ा चलन था। जिसकी लिखावट जितनी सुंदर और स्टाइलिश होतीउसे उतनी ही प्रशंसा मिलती। मैंने भी कई बार कोशिश की। अक्षरों को मोड़ाघुमायासजायालेकिन मेरी उँगलियाँ उस कला के साथ सहज नहीं हो सकीं। अंततः मैंने हार मान ली और सीधी-सादी लिखावट को अपना लिया।

तब लगा था कि शायद लिखने से जुड़ी मेरी सारी लड़ाइयाँ यहीं समाप्त हो गईं। लेकिन बाद में समझ आया कि असली संघर्ष तो उसके बाद शुरू होता है। सुंदर लिखावट सीखना आसान हैलेकिन अपने भीतर के विचारों को शब्द देना सबसे कठिन कामों में से एक है।

समय के साथ लिखना मेरे लिए केवल एक कौशल नहींबल्कि एक प्रश्न बन गया। एक ऐसा प्रश्नजिसका उत्तर मैं लगातार खोजता रहा। कई साहित्यिक कार्यक्रमोंकार्यशालाओं और चर्चाओं में जाने का अवसर मिला। वहाँ अक्सर एक सवाल बार-बार सुनाई देता था - “लिखना कब शुरू करें?” या “लिखने का सही समय क्या है?”

शुरुआत में मुझे भी लगता था कि शायद इसका कोई निश्चित उत्तर होगा। कोई ऐसा सूत्रजिसे जान लेने के बाद लेखन का रास्ता साफ़ हो जाएगा। लेकिन जितना पढ़ासुना और समझाउतना ही महसूस हुआ कि इस प्रश्न का उत्तर किसी कैलेंडर या घड़ी में नहीं छिपा है।

एक बार किसी ने मुझसे कहा था -

Hundred kilograms of reading will yield one gram of writing.

पहली बार सुनने पर यह वाक्य थोड़ा अतिशयोक्तिपूर्ण लगालेकिन बाद में इसकी गहराई समझ आई। लेखन कभी शून्य से पैदा नहीं होता। वह उन तमाम किताबोंअनुभवोंसंवादोंयात्राओं और भावनाओं का परिणाम होता है जिन्हें हम अपने भीतर जमा करते रहते हैं। जब तक भीतर का घड़ा नहीं भरतातब तक उससे कुछ छलकता भी नहीं।

यही कारण है कि लेखन की पहली और सबसे महत्वपूर्ण सीढ़ी पढ़ना है।

मुझे लेखक और पटकथा-लेखक श्रीधर राघवन का एक इंटरव्यू याद आता है। उनसे पूछा गया था, “एक लेखक के लिए सबसे ज़रूरी चीज़ क्या है?”

उन्होंने उत्तर दिया था, “किताबें पढ़ो क्योंकि किताबें तुम्हें दूसरी ज़िंदगियाँ जीने का अवसर देती हैं। जब तुम कोई किताब पढ़ते होतो कुछ समय के लिए किसी और के जीवन में प्रवेश कर जाते हो। तुम उसकी खुशियाँ महसूस करते होउसके डर समझते होउसकी असफलताओं से गुज़रते हो और उसकी उम्मीदों के साथ चलते हो।” शायद यही पढ़ने की सबसे बड़ी ताकत है। वह हमारे अनुभवों की सीमाओं को तोड़ देती है। इसलिए पढ़िए। उदास हों तो पढ़िए। खुश हों तो पढ़िए। अकेले हों तो और अधिक पढ़िए। किसी लक्ष्यप्रतियोगिता या दिखावे के लिए नहींबल्कि केवल आनंद के लिए। क्योंकि जो व्यक्ति आनंद के लिए पढ़ता हैवही एक दिन आनंद के लिए लिख भी पाता है। लेकिन लेखन केवल किताबों से नहीं आता। यदि ऐसा होता तो हर अच्छा पाठक अच्छा लेखक भी होता। सच यह है कि लेखन का दूसरा विद्यालय जीवन स्वयं है।

विज्ञान हमें बताता है कि विचार तब जन्म लेते हैं जब हमारा मस्तिष्क नई सूचनाओंअनुभवों और भावनाओं से टकराता है। इसलिए यदि लिखना चाहते हैंतो केवल पढ़ना पर्याप्त नहीं है। लोगों से मिलिए। बातचीत कीजिए। नए स्थान देखिए। यात्राएँ कीजिए। दुनिया को समझने की कोशिश कीजिए। और यदि दुनिया घूमने का बजट नहीं हैतो कोई बात नहीं। अपने शहर की किसी अनजानी गली में निकल जाइए। किसी चाय की दुकान पर बैठ जाइए। किसी गाँव के रास्ते पर टहल आइए। जीवन हमेशा बड़ी घटनाओं में नहीं मिलतावह अक्सर छोटी-छोटी बातों में छिपा होता है। क्योंकि लिखने के लिए ज़िंदगी जीनी पड़ती हैकेवल काटनी नहीं।

और यदि आप पहले से लिख रहे हैंतो एक और बात समझनी होगी… लेखन का संसार उतना रोमांटिक नहीं है जितना बाहर से दिखाई देता है।

• यहाँ अस्वीकृति रोज़ की साथी है।

 आप लिखेंगेलोग पढ़ेंगे नहीं।

 पढ़ेंगे तो पसंद नहीं करेंगे।

 पसंद करेंगे तो शायद प्रकाशित नहीं होगा।

 प्रकाशित होगा तो भी हो सकता है कि अपेक्षित प्रतिक्रिया न मिलेलेकिन यही प्रक्रिया शायद एक लेखक को गढ़ती है।

इस संदर्भ में अमेरिकी लेखक टॉम बेनेडेक की कहानी मुझे हमेशा प्रेरित करती है। उनके गैराज में वर्षों तक अधूरी पटकथाओं का ढेर जमा रहा। कुछ इतनी अच्छी थीं कि शायद बड़े-बड़े फिल्मकार भी उन्हें पसंद कर लेते। लेकिन वे अधूरी रह गईं।

एक दिन उन्होंने उन सभी अधूरी पटकथाओं को हवा में उछाल दिया और शॉटगन से उन पर गोली चला दी। बाद में यही प्रदर्शन “Shot by the Writer” शीर्षक से न्यूयॉर्क में एक प्रदर्शनी का हिस्सा बना।

पहली नज़र में यह घटना विचित्र लग सकती हैलेकिन इसके भीतर एक गहरी सीख छिपी है। एक लेखक को अपनी रचनाओं से प्रेम करना चाहिएलेकिन इतना भी नहीं कि वह उनसे बँध जाए। कभी-कभी आगे बढ़ने के लिए अपनी सबसे प्रिय और अधूरी रचनाओं को भी छोड़ना पड़ता है।

लेखन का अर्थ केवल प्रकाशित होना नहीं है। न ही इसका उद्देश्य पुरस्कारप्रसिद्धि या प्रशंसा प्राप्त करना भर है। लेखन दरअसल अपने भीतर की आग को जीवित रखने का एक तरीका है। वह आगजो हमें दुनिया को देखनेसमझने और व्यक्त करने के लिए प्रेरित करती है। इसलिए यदि आप अभी भी पूछ रहे हैं कि लिखने का सही समय क्या है तो शायद उसका उत्तर किसी घड़ी में नहींआपके भीतर है।

जब कोई विचार आपको चैन से बैठने न दे। जब कोई अनुभव बार-बार स्मृतियों के दरवाज़े पर दस्तक दे। जब कोई भावना शब्द बनने के लिए बेचैन हो जाए। और जब न लिखनालिखने से अधिक कठिन लगने लगे…

समझ लीजिएवही लिखने का सही समय है।