महाराष्ट्र के कोकणा आदिवासी लोकसाहित्य का अध्ययन

 

             आज 'आदिवासी साहित्य' पर बड़ी संख्या में लिखा पढ़ा जा रहा है। विभिन्न विश्वविद्यालयों, संस्थाओं द्वारा संगोष्ठियों तथा चर्चाओं का आयोजन हो रहा है। आदिवासी संस्कृति तथा लोक साहित्य का परिचय अलग-अलग भाषाओं की पुस्तकों के माध्यम से सामने आ रहा है। लेकिन इसके बावजूद भारत में कुछ आदिवासी समुदाय ऐसे भी है जिन पर विद्वानों का ध्यान केंद्रित नहीं हुआ है। महाराष्ट्र में 47 जनजातियां हैं। उन सब की संस्कृति, बोली-भाषा, कला-कौशल, गीत-संगीत-साहित्य एवं नृत्य आदि में भिन्नताएं हैं। उनमें पश्चिम महाराष्ट्र में स्थित ‘कोकणा’ एक प्रमुख जनजाति है, जिसकी लोकसाहित्य की स्वतंत्र एवं लम्बी मौखिक परम्परा रही है। महाराष्ट्र में इसके अतिरिक्त भील, महादेव कोली, मावची, वारली, कातकरी, पारधी आदि भी प्रमुख जनजातियां है। आदिवासी समाज पर 'मराठी' भाषा में जिस तरह लिखा जाना चाहिए था वैसा नहीं लिखा गया। यही कारण है कि आज आदिवासी समाज में कुछ भी परिवर्तन नहीं हो पाया है। कोकणा आदिवासी समाज पर बहुत कुछ लिखा जाना बाकी है क्योंकि उनकी अपनी संस्कृति है, साहित्य का संसार है, बोली-भाषा है, परम्पराएँ हैं, विधि-विधान है। आदिवासी साहित्य पर सबसे अधिक परिनिष्ठित भाषा हिंदी, मराठी, गुजराती, पंजाबी में ही साहित्य रचते हुए रचनाकार देखने को मिलते हैं। लेकिन लोकभाषा में बहुत कम रचनाएँ लिखी जाती है। इसका मूल कारण क्या है? यह जानना आज आवश्यक है। आज लोक भाषा में पुरखा साहित्य को सुरक्षित रखने की सबसे अधिक जरूरत है। आदिवासी भाषाओं में विभिन्न मौखिक साहित्य मौजूद है लेकिन बहुत कम लोग उनके पुरखा साहित्य से परिचित हो पाते हैं। आधुनिकता के चलते मौखिक गीत कथाओं की बजाए हिन्दी-मराठी फिल्मी गीतों की धुन सुनाई देने लगी है। कोकणा आदिवासी का स्वतंत्र लोकसाहित्य है, जिनमें लोकगीत, लोककथा, लोकगाथा, लोकनृत्य, लोकसंगीत, प्रकीर्ण साहित्य मौजूद है। इस आलेख के माध्यम से ‘कोकणा जनजाति के लोक-साहित्य के बारे में जानने की कोशिश करेंगे।

          भारत में आदिवासी साहित्य मराठी, हिंदी, अंग्रेजी और उसी के साथ संथाली, बोडो, मिजो, गोंडी आदि आठवीं अनुसूची की तमाम प्रमुख भाषाओं को छोड़ दिया जाए तो मूल भाषा में बहुत कम साहित्य लिखा एवं संकलित किया जा रहा है। इससे उन्हें ऐसा लगता होगा कि इसे पढ़ने वाला कोई नहीं रहेगा या प्रसिद्धि नहीं मिल पाएगी। लेकिन यह भी याद रखना जरूरी है कि आज जितना भी शिष्ट साहित्य निर्मित हुआ है या निर्मिति की प्रक्रिया में है सब के सब लोकसाहित्य से ग्रहण किया हुआ है। इसी प्रकार से महाराष्ट्र में भिल्ली, कोकणी बोलियों में कहीं पर भी लोकसाहित्य का संकलन करने का तथा उसको शब्दबद्ध करने का कोई सार्थक प्रयास नहीं दिखाई दे रहा।  जो हुआ है वह इक्के दुक्के लोगों ने अपना शोध प्रबंध पूरा करने के लिए आदिवासी लोकसहित्य पर अपना काम किया है। इस दृष्टि से आज मूल भाषा की तरह तमाम आदिवासी भाषाओं में भी लोकसाहित्य का रचाव-बचाव होना जरूरी है। आदिवासी बोली भाषाओं में ही संस्कृति का गुण, साहित्य का मूल छिपा है। भविष्य में लोकसाहित्य के माध्यम से ही किसी संस्कृति को बचाया जा सकता है। समाज का अस्तित्व उनकी संस्कृति, पुरखा साहित्य, बोली-भाषा आदि पर निर्भर है। इस कारण आज आदिवासी पुरखे साहित्य को लिपिबद्ध करके समाज को जागरूक करने की जरूरत है। क्योंकि जब किसी बोली भाषा पर खतरे मंडराने लगते हैं तो उनकी संस्कृति और साहित्य भी नष्ट होने के संकेत मिलते हैं। इस दृष्टि से आदिवासी लोक साहित्य का संकलन करने की आवश्यकता है।

कोकणा आदिवासी लोकसाहित्य का परिचय -

         'कोकणा आदिवासी' समाज भारत के पश्चिम महाराष्ट्र के नासिक, ठाणे, धुले, नंदुरबार, तथा गुजरात के डांग, सूरत, वलसाड तथा दादरा नगर हवेली और कर्नाटक, राजस्थान आदि के सिमित क्षेत्र में फैले हुए दिखाई देते है, किंतु इन सब की भाषा बोली, संस्कृति, साहित्य में भिन्नताएं दिखाई देती है। कोकणा आदिवासी की सबसे ज्यादा जनसंख्या महाराष्ट्र राज्य में दिखाई देती है। कोकणा आदिवासी समाज पुराने समय से ही खेती व्यवसाय करते हुए दिखाई देते हैं। साथ में पशुपालन, शिकार, जंगली वस्तुओं से विभिन्न कलाएँ आदि भी। इनका अपना स्वतंत्र पुरखा साहित्य उनकी बोली भाषा में जीवित है। जिसके माध्यम से वह अपनी दिन की थकावट दूर करते है, शाम के समय मनोरंजन करते और जीवन साधारण ढंग से बिताते हैं। रात के समय दादा-दादी कहानी सुनाते हैं। समाज में लोकगीत, लोककथा, लोकगाथा, लोकनृत्य मौखिक रूप से एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक हस्तांतरित होती आ रही है। लेकिन नई सदी में युवकों का रुख आधुनिकता के तरफ बढ़ रहा है, इसलिए असंतोषजनक स्थिति देखने को मिलती है। इसके बावजूद मराठी में कोकणा आदिवासी लोकसाहित्य को लिपिबद्ध करने का प्रयास जिन विद्वानों ने किया है, उनमें प्रमुख रूप से गोविंद गारे, कै.आवारी गुरुजी, डॉ.भास्कर गिरधारी, प्रा.बी..देशमुख उसी की परम्परा में देवदत्त चौधरी, मोतीराम देशमुख, सौ.विजया सोनार आदि विद्वानों ने बरसक प्रयास किया है। कोकणा आदिवासी समाज के लोकसाहित्य का संकलन करके समाज को परिचित कराने का प्रयास अवश्य किया है। किंतु इन सबके बावजूद बहुत सारा मौखिक साहित्य उपलब्ध है, जिसे लिपिबद्ध करने की जरूरत है। वर्तमान में आदिवासी साहित्य को जानने के लिए लोगो की रुचि दिखाई दे रही है तथा गैर आदिवासी साहित्यकारों ने कुछ मात्रा में उनके लोकसाहित्य संकलित करने की कोशिश की है। आज जो कोकणा आदिवासी लोकसाहित्य बढ़ी मात्रा में उपलब्ध होते हुए भी प्रेषित नहीं किया जा रहा है। कोकणा साहित्य महाराष्ट्र के 'मराठी' भाषा में ही लिखा गया है अन्य लोक साहित्य की दृष्टि से कोकणा आदिवासी लोक साहित्य पर संशोधन करने की आवश्यकता महसूस हो रही है, क्योंकि उनके साहित्य में लोकजीवन प्रकृति को समर्पित है तथा जिस तरह से अन्य बोली-भाषाओं गोंडी, संथाली, मुंडारी,आदि का लोकसाहित्य लिपिबध्द होकर मौजूद है वैसे कोकणा आदिवासी का नहीं है। कोकणा लोकसाहित्य मौखिक रूप में जिवित हैं। लेकिन लोगों का आजीविका के बहाने नगरों से सम्पर्क आने के कारन वह भी लुप्त होने के कगार पर है।

लोकजीवन का कोई भी ऐसा अंग लोकसाहित्य को माना जाता हैं। इनमें लोकगीत, लोकगाथा, लोकनाट्य, लोकसुभाषित अर्थात लोकोक्तियां, पहेलियां, मुहावरे तथा सूक्तियों आदि भी लोकसंस्कृति के अन्तर्गत आ जाते हैं। किसी समुदाय का शिक्षा संस्कार आचार-विचार के अलावा सामाजिक पारिवारिक ऋतु सम्बंधी, कृषि सम्बन्धी गीत, कथाओं आदि के अतिरिक्त राजनैतिक एवं राष्ट्रीय चेतना से परिपूर्ण गीत, कथायें, लोकनाट्य के माध्यम से इनके उत्सव पर्व-त्यौहार आदि का पुट दिखाई देता है। कोकणा आदिवासी समाज में मनोरंजन की सामग्री ऋतु की तरह परिवर्तित होती रहती है। परिवार के तथा ग्राम के देवी देवता की पूजा के लिए मंत्र और गीत के साथ साथ डाक वाद्य का प्रयोग किया जाता है, विवाह तथा अन्य त्यौहारों पर संबल वाद्य का प्रयोग किया जाता है। डोंगरदेव उत्सव पर पावरी, घांगली वाद्य बजाया जाता है। इसके अतिरिक्त भी कहीं सारे वाद्य इस समाज में प्रचलित है, जो विभिन्न लकड़ियों से तथा चमड़े से बनाए जाते हैं। नृत्य गीत में महिला पुरुष साथ में नृत्य करते दिखाई देते हैं इस समाज में मतभेद कम दिखाई देता है। इससे कोकणा आदिवासी समुदाय एकत्रित समूह में दिखाई देता है। इनके नृत्यगीत सीखाए नहीं जाते, वह अनुकरण के माध्यम से आगे की पीढ़ी उसे स्वीकार करती है। पर वे भी वर्तमान में कम मात्रा में अनुकरण करते दिखाई देते हैं। दरअसल पीढ़ी-दर-पीढ़ी चलने वाले यह नृत्य, गीत, कथाएं, परंपराएं इन पर कहीं--कहीं आधुनिकता हावी होती नज़र आती है, इस वजह से मूल साहित्य नष्ट होने की सम्भावना है। विश्व में आदिवासी साहित्य के बारे में आदिवासी साहित्यकार वंदना टेटे कहती हैं कि“आदिवासी साहित्य से तात्पर्य उस साहित्य से है जिसमें आदिवासियों का जीवन और समाज उनके दर्शन के अनुरूप अभिव्यक्त हुआ है।”1 यानी पूरी दुनिया में आदिवासी लोकसाहित्य मौजूद है सिर्फ उसे लिखने की आज जरूरत है। परम्परा से चली आ रही संस्कृति तथा मौखिक साहित्य, परम्परा को बचाना है तो उसे उसी रूप में लिखने की आवश्यकता है। लोकसाहित्य का अध्ययन करने वाली डॉ.विद्या चौहान कहती हैं- “लोक साहित्य की आधारभूमि भी मनुष्य की हृदतंत्री से झंकृत उल्लास और अवसाद युक्त भाव-तरंगों से रसप्लावित है। सुख-दुख, आशा-निराशा, हास्य रुदन के कठिन घात-प्रतिघात से भावाकुल होकर मनुष्य संवेदनशील हो उठता है। हृदय की सवेंदना ही जब मानव की वाणी में विचलित होती है तो साहित्य की सृष्टि होती है।”2 मौखिक रूप में कोकणा आदिवासी साहित्य हजारों सालो से चला आ रहा है उसे आज संरक्षित करने की जरूरत है। लोक-साहित्य लोकसंस्कृति का एक अभिन्न अंग है। इसके अभाव में लोकसंस्कृति का अध्ययन अपूर्ण ही माना जाता है। इसलिए लोक साहित्य किसी समुदाय को समझने के लिए तथा उनकी संस्कृति को बचाने के लिए लोकसाहित्य को सुरक्षित रखना होगा। लोकसाहित्य से ही किसी राष्ट्र के इतिहास, भूगोल और सांस्कृतिक विरासत को समझ सकते हैं।

 लोककथा-लोकगाथा

          “लोक साहित्य के क्षेत्र में लोक कथाओं का विशिष्ट स्थान है। सच तो यह है कि इन कथाओं के द्वारा सर्व साधारण जनता के मन का जितना अनुरंजन होता है उतना अन्य किसी साधन के द्वारा नहीं होता। भारत वर्ष लोक कथाओं की उत्स भूमि है। यहां की प्राचीन कथाओं ने समस्त संसार के कथा साहित्य को प्रभावित किया है।”3 कोकणा आदिवासी समाज में पुरखा साहित्य बड़ी मात्रा में उपलब्ध है। जिनमें विभिन्न लोककथाएं प्रचलित है। जिनमें  डोंगरदेव कथा, कन्सरामाउली कथा, उन्हयाबाल कथा, महादेव-पार्वती, खंडेराव महाराज की कथाएं मौजूद है। इन सब के अतिरिक्त भी कुछ दंत कथा, मनोरंजपूर्ण कथा मौजूद है। इन लोककथाओं में परम्परा का पुट मिलता है जो उस समय की पूजा विधि तथा उस समय का सुख-दुख, हर्ष-उल्लास इन लोककथाओं के माध्यम से समझ में आता है। यह कथा कहने वाले एक या दो लोग रहते हैं और बाकी सभी लोग सुनते हैं। इनमें कुछ कथा विशिष्ट समय में ही कही जाती है जैसे कि डोंगर देव की कथा डोंगरदेव उत्सव के समय होती है। किसी व्यक्ति के मृत्यु के बाद नौवें दिन एक कथा गाई जाती है। जिसमें परिवार के पुरखो के नाम लिए जाते हैं तथा उनकी अच्छाई के गुणगान गाए जाते हैं। इस तरह से और भी छोटी-मोटी कथाएं प्रचलित है। जो समय-समय पर उनके उत्सव, त्योहारों में गाई जाती है।

लोकगीत -

लोकगीत वह गेय गीत है, जिससे जन-मन का अनुरंजन सदा से होता आ रहा है। इन गीतों को स्त्री और पुरुष समान रूप से गाते हैं। इन गीतों में कुछ ऐसे गीत उपलब्ध होते हैं। जो केवल स्त्रियों द्वारा ही गाए जाते हैं। कृष्णदेव उपाध्याय ने लोकगीतों को छ: श्रेणियों में विभक्त किया है “संस्कार सम्बंधी गीत, ऋतु सम्बंधी गीत, व्रत सम्बन्धी गीत, जाति के गीत, श्रम गीत, देवी-देवता गीत।”4 आदि कोकणा आदिवासी समाज में डोंगरदेव एक प्रसिद्ध उत्सव मनाया जाता है, जो परम्परा से आज तक चलते आ रहा है। इसमें प्रकृति पूजा का संदेश दिया जाता है। इस उत्सव में पुरुषों के द्वारा विभिन्न गीत समूह में रचे गए होते हैं। कुछ उदाहरण देखते है“काकड़ी ना बाऴ,काकड़ी ना बाऴ। /नवसाला पाव नवसाला पाव/मनी नहीं भाव मनी नहीं भाव/ देव मला पाव, देव मला पाव।” इस गीत में टेक पद्य दिखाई देते हैं। तथा भगवान ने पास पुत्र उत्पन्न के सम्बन्ध में नवस/ वचन पूरा करने को कह रहे हैं। द्वितीय गीत देखते हैं। “हाय कन्सरा हाय माऊलीव, हाय कन्सरा हाय माऊलीव/ भोळ्या भक्ताला हाय पावलीव,  भोळ्या भक्ताला हाय पावलीव।” उपर्युक्त गीत में कोकणा आदिवासी समाज में सीधा, सरल भक्त कन्सरामाऊली को दर्शन देने के लिए प्रार्थना कर रहे हैं। उदाहरण के रूप तृतीय गीत “शिटीना पावा वाज रे.. महादेव रे..., शेंदोडनी हवा भारी रे.. महादेव रे..., शिटीना पावा वाज रे..महादेव रे..., कन्सर्यानी हवा भारी रे.. महादेव रे..."5 इस गीत में मुरली बजाने का तथा शेंदोड गढ़, महादेव, कन्सरामाऊली आदि का नाम लिया गया है। इन गीतों को गाने वाले दो दल होते हैं एक दल आगे कहता है तत्पश्चात दूसरा दल उसी गीत को दोहराता है। लगभग इस प्रकार के समाज में बहुत सारे गीत प्रचलित हैं लेकिन उन्हें विशिष्ट समय पर ही गाया जाता है। इसी प्रकार से विवाह के गीत भी बहुत प्रचलित हैं। जो गाँव की महिला जोर-जोर से गाती हुई दिखाई देती हैं। जिसमें मांडव गीत में गड्ढा निकालने के गीत, डाळा टाकना अर्थात जामुन की टहनी ड़ालने के गीत। हल्दी के दिन गाए जानेवाले गीतों में मांडव सुतवने/ धागा लिपटने का गीत, हल्दी कुटने के गीत, परिवार के रिश्तेदार/मेहमानों के गीत, तेलवना के गीत, सावा कुटने के गीत, जिनके नाम से हल्दी लगाई जाने वाली है, प्रथम उनके नाम से /मानाची हळद, देवका गीत, हल्दी लगाने के गीत। शादी के दिन के गीतों में दुल्हा घर से निकलते समय के गीत, हनुमान दर्शन के गीत, यात्रा के गीत, शादी मंडप के गीत, कपड़े देने के गीत, शेवंती के गीत, दुल्हन को विदा करने के गीत, घरबरणी के गीत, पैर धोने के गीत, सेहरा निकालने के गीत, हल्दी उतारने के गीत, नहाने के गीत, गौना के गीत आदि इसके अतिरिक्त भी कुछ विधिगीत, पूजा के गीत, श्रम गीत प्रमुखता से गाए जाते हैं। देवी-देवता के गीत विभिन्न समय-समय में गाए जाते हैं।

लोकनृत्य -

कोकणा आदिवासी समाज में विभिन्न लोकनृत्य प्रचलित हैं। मानव की मूल प्रवृति से निरन्तर साहचर्य एवं मंगल कामना की भावना तथा प्रेम का अभिन्न पुट इन लोकनृत्य में देखने को मिलता है। कोकणा आदिवासी समाज में प्राचीन समय से ही मनोरंजन के रूप में तमाशा, मावल्या, बोहाड़ा, चोख्या, पावरी नृत्य, मादोल नृत्य, ठाकरया नृत्य, तुर नाच आदि लोकनृत्य प्रसिद्ध है, सभी लोक नृत्य में लोक वाद्य बदलता रहता है। हर एक लोक नृत्य की अलग पहचान है। जिनमें डोंगर देव उत्सव में पावरी, चोख्या, मावल्या, प्रसिद्ध है तथा बोहाड़ा, की भी एक अलग विशेषता है। बोहाड़ा नृत्य में “बेताल यह श्मशनभूमी में रहनेवाली देवता। उसकी पत्नी का नाम भवानी जगदंबा। इसी के नाम पर बोहाड़ा- उत्सव मनाते हैं। रात भर पुराणों की रामायण, महाभारत की, देवताओं की कथाओं के आधार पर मुखौटे लगाकर नाचते हैं। इस तरह पूरी रात नृत्य होता रहता है।”6  यह नासिक जिले के सुरगाणा, कलवण में कनाशी तथा पेठ, त्र्यम्बक आदि तहसील में विशिष्ट समय पर यह खेला जाता है। महाराष्ट्र में 'तमाशा' यह पुराने समय से ही एक मनोरंजन का माध्यम के रूप में इस्तेमाल किया जाता है, उसी के साथ इसके माध्यम से कुछ संदेश देने का भी प्रयास किया जाता है “तमाशा एक प्रसिद्ध लोकनाट्य है, जो विशेष रूप से ग्रामीण, पिछड़ी, अर्ध सभ्य जनता के बीच खेला जाता है। संभ्रांत सुशिक्षित वर्ग से इसका दूर का भी सम्बन्ध नहीं रहता। अश्लील नृत्य एवं भौंडे संवादों में ढांचे पर खड़ा यह लोकनाट्य लावनियों के सवाल-जवाब पर प्रधान रूप से निर्भर करता है। वाद्यवृंद का संगीत - विधान ही इस लोक नाट्य का प्रधान अंग है।”7 तमाशा यह पूरी रात तक चलने वाला लोक नाट्य है जिसकी शुरुआत गणेश वंदना से की जाती है। गण, गवलन, नृत्य, आदि इसमें होते हैं। यह गांव के उच्चे स्थान पर होता था, आजकल यह मंच पर हो रहा है।

         इसके अतिरिक्त कोंकणा आदिवासी लोकसाहित्य में विभिन्न लोकोक्तियां, मुहावरे, पहेलियां प्रचलित हैं, जो विभिन्न समय पर बोलने-सुनने को मिलती है। लोकसाहित्य में जो गीत, नृत्य होते हैं इनमें हाथों से बनाए लोकवाद्यों का भी विशिष्ट महत्व है। जिससे गीत में चार चांद लग जाते हैं। क्योंकि संगीत के बिना गीत नृत्य की कल्पना भी नहीं कर सकते। इसलिए आदिवासी का साहित्य मूल रूप से गीत कथा, संगीत नृत्य ही है यह उनकी संस्कृति को जीवित रखने का माध्यम है। इसलिए उनके संरक्षण के लिए उन्हें लिपिबद्ध करने की सबसे अधिक आवश्यकता महसूस हो रही है।

सन्दर्भ सूची -

1. वाचिकता आदिवासी दर्शन, साहित्य और सौंदर्य बोध- वंदना टेटे, राधाकृष्ण प्रकाशन, दिल्ली, 2020, पृ.19

2. लोक साहित्य- डॉ. विद्या चौहान, सरस्वती प्रकाशन, कानपुर, 1986, पृ.18

3. लोक संस्कृति की रूपरेखा- कृष्णदेव उपाध्याय, लोकभारती प्रकाशन, इलाहाबाद, 2014, पृ. 293

4. वही पृ. 265

5. संकलित लोकगीत शाहु चव्हाण, ग्राम-मोहबारी, पोस्ट-पिम्पले, तहसील-कलवन, जिला-नासिक (महाराष्ट्र)

6. हाँ! हम हिन्दू हैं- लक्ष्मण टोपले, अनुवाद प्रसन्न दामोदर सप्रे, सुरुचि प्रकाशन, नई दिल्ली, 2011, पृ.81

7. लोक साहित्य के विविध आयाम- डॉ. परवीन निज़ाम अंसारी, विश्वविद्यालय प्रकाशन, वाराणसी, 2016, पृ.28

 

डॉ. निलेश शिवाजी देशमुख

ईमेल – nileshd2112@gmail.com