कृपया प्रतीक्षा करें...
✍️ लेखन: मोहिनी रानी 'मधुमयी'
प्रेम में पड़े हुए होते हैं कुछ ऐसे भी
अभागे अधूरे व्यक्तित्व
जो कभी पूरे नहीं हो सकते
कभी नहीं.. सृष्टि के अंत तक भी नहीं...
अकेलेपन के अंधेरों में गिरते-संभलते
अधूरेपन को अपना भाग्य मान
वे बस देखना चाहते हैं
दूसरों की मंज़िल में
अपनी तलाश को पूरा होते
दुनिया भर के प्रेमी-प्रेमिकाओं में
दिखता है उन्हें सिर्फ अपना चेहरा
ये जानते हुए भी कि
ये सिर्फ मृग-मरीचिका है
जिसका छलावा अंत में
केवल एकाकीपन, आँसू और दुःख ही देगा
मिलेगी केवल असमय मृत्यु
वो भी.. अंतहीन प्यास के साथ
फिर भी भटकते हैं.. दौड़ते हैं...
दुनिया भर की सुंदर प्रेम-कहानियों के पीछे-पीछे
तलाशते हैं खुद के लिए कोई सहारा
ये जानते हुए भी
कि उनके पाँवों के हिस्से में तो ज़मीन है ही नहीं
और एक दिन दम तोड़ देते हैं
खुद से लड़ते हुए
प्रेम को खोकर जीते हुए लोग
आजीवन पूरे नहीं हो पाते
प्रेम को खोने की कसक जिंदा नहीं रहने देती
और कर्तव्य मरने नहीं देता
पर कभी-कभी लगता है कि
हज़ारों टुकड़ों में बँटकर जीने से अच्छा है
दो अधूरे लोगों का एक हो जाना ।
नवपल्लव बुक्स की वेबसाईट के लिए कवयित्री द्वारा चयनित कविता, मधुमयी, पृष्ठ-62
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